Tuesday, 23 September 2025

रामधारी सिंह दिनकर ओज और उर्जा के अद्वितीय कवि

 

रामधारी सिंह दिनकर ओज और उर्जा के अद्वितीय कवि
तबीयत चाहती है बात कुछ तुमको सुनाऊं
मगर, तुम कौन हो जो पंक्ति मेरी पढ़ रहे हो
‘स्वप्न और सत्य’-दिनकर
‘दिनकर’ का उदय 23 सितम्बर 1908 को तत्कालीन मुंगेर जिला (सम्प्रति बेगूसराय) के सिमरिया गांव में हुआ था. इनके पिता साधारण किसान थे. गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं था. किन्हीं के दरवाजे पर स्कूल खोला गया. बाद में, गांव में ही अपर प्राइमरी स्कूल खुल गया. जिसमें वह पढ़ने गये. बारह वर्षीय दिनकर ने 1920 में गांधी जी का दर्शन किया. राष्ट्रीय स्कूल बारो (सैयद जाफर सिद्दीकी ने गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रेरित होकर सरकारी मिड्ल स्कूल, बारो के समानान्तर यह स्कूल खोला था) ने ही दिनकर में राष्ट्रीयता का बीज बपन किया और कालान्तर में ‘रश्मिरथी’ पर आरूढ़ दिनकर के ‘हुंकार’ को लोगों ने ‘कुरूक्षेत्र’ में सुना.
‘दिनकर’ की कविताओं में राष्ट्रप्रेम कूट-कूट कर भरा हुआ है. इन्हें ओज और ऊर्जा का अद्वितीय कवि माना गया है. भारत की विशेषता को इन्होंने अपनी कविता ‘हिमालय का संदेश’ में इस तरह व्यक्त किया है- भारत एक विचार है, एक आदर्श है, एक मूल्य है. मनुष्य को जगाने की शक्ति भारत में है. दुनिया में जहां कहीं मानवता परेशान हुई है, भारत वहां जाकर खड़ा हो जाता है. पूरी दुनिया में सत्य, प्रेम, सहयोग, सद्भाव, सदाचार, सहिष्णुता के रूप में भारत सशरीर दिखायी पड़ता है. बड़ी अच्छी बात कही है एक विदेशी आलोचक ने कि गद्य चलना है जबकि कविता नृत्य करना. डाॉ नन्दकिशोर ‘नवल’ ने सच ही कहा है कि ‘दिनकर की कविताओं में राष्ट्रीयता और उद्बोधन भरा स्वर ही नहीं है इतिहास का मोहक संदर्भ भी है.’
अंग्रेजों का दमन अपनी सीमा लांघ रहा था, विदेशी साम्राज्यवाद के लाठी, बूट और गोली की दहशत में भारत जी रहा था. ऐसे माहौल में दिनकर के झंझावाती स्वरों ने राष्ट्र को जागृत, सचेत, गतिशील और ऊर्जावान बनाना शुरू किया. कवि अपने आगमन की सूचना किस प्रकार दे रहा है-
उदयाचल पर आलोक शरासन ताने
मैं आया जग में गीत विभा का गाने.
 
कवि कभी ठंडा नहीं पड़ा है. अनल-धर्मी गुण और प्रभंजन की प्रवृत्ति सर्वत्र, सदैव दिखायी पड़ती है. इनकी उक्ति में उष्मा है, उत्साह है और है उद्वेलन.
सबसे बड़ा धर्म है नर का, सदा प्रज्ज्वलित रहना
दाहक शक्ति समेट स्पर्श भी, नहीं किसी का सहना.
 
राष्ट्रीय कविता की ओर कवि के उन्मुख होने का तात्कालिक कारण था. उस समय के युवा वर्ग के सम्मुख स्वतंत्रता की प्राप्ति का एक लक्ष्य था. नेतृत्व देने वाले लोग युवाओं को क्रांति के लिए हर तरह से तैयार कर रहे थे. दिनकर की ओजस्वी वाणी में उत्साह जगाने की शक्ति थी. युधिष्ठिर स्वर्ग जा रहे हैं तो जाने दे, परन्तु हमें अर्जुन और भीम वापस कर दो, मुझे गांडीव और गदा दे दो.
रे रोक युधिष्ठिर को न यहां, जाने दे उनको स्वर्ग धीर.
पर फिरा हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर.
 
दिनकर की रचनाओं के शीर्षक ही इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि उनमें पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र करने की कितनी व्यग्रता थी.
कविता को अनगिनत लोगों तक पहुंचाने का महत्तर कार्य दिनकर की ओजस्वी वाणी ने किया. इनकी कविता को, इनके ही स्वर में सुनने का अवसर जिन्हें मिला, उनमें एक नयी स्फूर्ति का स्फुरण हुआ. कविता के प्रति सहज अनुराग को विकसित करने का श्रेय छायावाद के बाद के कवियों ने किया और मंच से काव्य के रसिक श्रोताओं का संबंध प्रगाढ़ होता गया. कविता और कवि दोनों के सम्मिलित दायित्व को समझने में जनसाधारण को भी सहूलियत होने लगी. जनता समझने लगी कि-
कविता जब किसी के पक्ष में या किसी के खिलाफ
अपनी पूरी अस्मिता के साथ खड़ी होती है
तब ईश्वर से भी बड़ी होती है.
-कवि छविनाथ मिश्र
 
दिनकर के पूर्ववर्ती कवियों में श्याम नारायण पांडेय, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिली शरण गुप्त थे. सुभद्रा कुमारी चैहान ने ‘झांसी की रानी’ लिखकर लोगों में जोश और उमंग बढ़ाया. राजस्थान में संत और सूरमा दोनों हुए हैं. श्याम नारायण पांडेय ने वन-वन फिरने वाले राणा प्रताप के बहाने भारतीय बलिदानी के लिए मुखरित स्वर में कहा-‘ तुम अजर बढ़े चलो.’ इन्होंने जनता की भाषा को काव्य भाषा बना दिया. यह एक अनोखी घटना थी. हिन्दी कविता को जनोन्मुख बनाने में ‘दिनकर’ और बच्चन का स्तुत्य योगदान रहा है. हिन्दी और राष्ट्रीयता साथ-साथ संचरित होने लगी. श्याम नारायण पांडेय तथा रामधारी सिंह दिनकर की वाणी में जैसी ओजमयी झंकृति थी, वह दुर्लभ है.
प्राची के प्रांगण बीच देख
जल रहा स्वर्ण-युग अग्नि ज्वाल,
तू सिंहनाद कर जाग यती
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
 
‘सामधेनी’ दिनकर का कविता-संग्रह है. इसे कलम के जादूगर बेनीपुरी को समर्पित किया है. बेनीपुरी को इन्होंने अपनी आत्मा का शिल्पी कहा है-
विधु पर आ जाऊं मिले अगर आधार एक
आत्मा के शिल्पी, बढ़ा किरण का तार एक
 
दिनकर कहते हैं-‘ राष्ट्रीयता का अंकुर मेरे भीतर ‘छात्र सहोदर’ पत्र ने उगाया था. वह अपने ढंग पर बढ़ता भी आ जा रहा था. किन्तु, जब मैं बेनीपुरी की संगति में आया, वह पौधा लहलहाकर वृक्ष बन गया.’ (संस्मरण और श्रद्धांजलियां)
दिनकर की राष्ट्रीयता को हम इस तरह सहेज सकते हैं- दिनकर ने क्रांतिकारियों का अभिनंदन किया, देश के अतीत और भूगोल की वंदना की, इसके साथ-साथ देश की आर्थिक विषमता के प्रति रोष व्यक्त किया. शोषित, पीड़ित और उत्पीड़ित जनता के लिए दिनकर ने खुलकर कहा-
श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र
भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर,
जाड़ों की रात बिताते हैं.
 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी विषमता और उत्पीड़न के खिलाफ इनकी लेखनी आग उगलती रही. ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ में इन्होंने लोकशक्ति के विद्रोह को स्वर दिया है.
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने राष्ट्रकवि दिनकर के संदर्भ में कहा है-‘इस युग के साहित्य की धड़कनें राष्ट्रीय स्वर पर हां से सुनी गयी और जिसके खटके सर्वत्र सराहे गये और जिसका जीवंत सृजन बेयाद किये हुए याद हो जाने लगा, वह साहित्य था रामवृक्ष बेनीपुरी और रामधारी सिंह दिनकर का.’ दिनकर अपनी रचनाओं की पंक्ति-पंक्ति में रचे-बसे हैं.
----- कृष्णमोहन सिंह

Thursday, 18 September 2025

भूमिहारों की संसदीय सीटों में भागीदारी कैसे सुनिश्चित हो

⁕ #नवादा लोक सभा से आपकी मजबूत दावेदारी इसलिए है क्योंकि आप #बरबीघा, #वारिसलीगंज और #हिसुआ लगातार जीत रहे हैं;
⁕ #मुंगेर लोक सभा में आप मजबूती से डटे हैं क्योंकि आप #मोकामा और #लखीसराय जीत रहे हैं;
⁕ #बेगूसराय लोक सभा से आप इसलिए जीत रहे हैं क्योंकि #बेगूसराय सदर, #मटिहानी और #तेघड़ा से आप विजयी हो रहे हैं;  
⁕ #जहानाबाद लोक सभा पर मजबूत पकड़ का कारण #घोसी से स्थाई प्रतिनिधित्व के अलावे #अरवल जीतना रहा है, अब नये परिसीमन के बाद #जहानाबाद सदर भी मजबूती से उभर रहा है;
⁕ #पाटलीपुत्र लोक सभा पर वापसी करनी है तो #विक्रम के साथ #पालीगंज प्लस एक और सीट पर मजबूत दावेदारी आपको पेश करनी होगी। 
औसतन दो से तीन विधानसभा में मजबूती से ही संसदीय राजनीति का आप हिस्सा बन सकेंगे इसलिए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। 
✍ साकेत बिहारी शर्मा 

Tuesday, 16 September 2025

अशोक महतो गिरोह

अशोक महतो गिरोह

अपराधी अशोक महतो गिरोह , जो भारतीय राज्य बिहार में सक्रिय था , का नेतृत्व अशोक महतो करता था और इसमें पिंटू महतो शामिल था। अशोक महतो और उसका गिरोह 2005 में संसद सदस्य ( लोकसभा ) राजो सिंह की हत्या के लिए जिम्मेदार था । अशोक महतो को कैद किया गया था, लेकिन 2002 में वह नवादा जेल से भाग गया। पिंटू महतो ने जेल से भागने के दौरान तीन पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी। गिरोह के नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे कुर्मी या कोइरी जाति के थे और उन्हें नवादा और शेखपुरा क्षेत्रों में पिछड़ी जातियों का समर्थन प्राप्त था । महतो गिरोह भूमिहारों के खिलाफ प्रतिशोध की लड़ाई लड़ रहा था। महतो और उसका गिरोह 1990 के दशक के अंत में बड़ी संख्या में अगड़ी जाति के लोगों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार था।

- अशोक महतो गिरोह के सदस्य
अशोक महतो, पिंटू महतो
- संचालन की तिथियां
1990 के दशक
- समूह
कुर्मी , कोइरी
- मुख्यालय
नवादा और शेखपुरा

महतो-सिंह प्रतिद्वंद्विता

महतो और गैंगस्टर अखिलेश सिंह के बीच प्रतिद्वंद्विता ने बिहार के नवादा , नालंदा और शेखपुरा जिलों के 100 से अधिक गांवों को प्रभावित किया। 1998 और 2006 के बीच, नवादा जिले में 200 से अधिक लोगों की जान लेने वाली प्रतिद्वंद्विता, भूमिहारों और कोइरियों के बीच जातिगत संघर्ष से उपजी थी। दोनों समूहों के बीच संघर्ष प्रभावित जिलों में पत्थर-कुचलने और रेत उठाने की व्यवस्था पर अधिकार तय करेगा। 2003 में, महतो गिरोह ने कथित तौर पर विधान सभा के सदस्य (एमएलए) अरुणा देवी (अखिलेश सिंह की पत्नी) के पिता और छह साल के एक लड़के सहित पांच अन्य लोगों की हत्या कर दी थी। यह बताया गया था कि हत्याएं सात मजदूरों की मौत का बदला लेने के लिए की गई थीं, जिन्हें कथित तौर पर अखिलेश सिंह गिरोह ने मार डाला था ।

महतो-सिंह प्रतिद्वंद्विता दो गिरोहों के बीच वर्चस्व की प्रतिद्वंद्विता थी लेकिन इन दोनों गिरोहों में से प्रत्येक के समर्थन में जातियों की गोलबंदी भी हुई। 2005 के चुनाव के दौरान, अखिलेश सिंह की पत्नी अरुणा देवी क्षेत्र की विधानसभा के लिए लोक जनशक्ति पार्टी की उम्मीदवार थीं। उनके समर्थकों में से एक के अनुसार, अखिलेश सिंह पर हत्या और अपहरण के आरोप हल्के थे और उन्होंने अपने समुदाय, भूमिहारों के सम्मान के लिए लड़ने के लिए हथियार उठाए थे। कहा जाता है कि अशोक महतो और उसके लोगों ने कोइरी समुदाय और अन्य पिछड़ी जातियों के अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी संभाली थी। अरुणा देवी को अशोक महतो के भतीजे प्रदीप महतो के विरोध का सामना करना पड़ा , जिसके खिलाफ भी कई आरोप थे। अशोक महतो क्षेत्र में बड़ी संख्या में उच्च जाति के लोगों की हत्या के लिए भी जिम्मेदार था।

अखिलेश सिंह सरदार अशोक महतो गिरोह के लिए एक समस्या बने रहे, अंततः उनकी पत्नी अरुणा देवी वारिसलीगंज की विधायक बन गईं, अशोक महतो गिरोह को अभी भी अखिलेश सिंह सरदार के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, अशोक महतो ने यह भी स्वीकार किया कि जब वह जेल में था तो अखिलेश सिंह सरदार द्वारा उसे कई बार प्रताड़ित किया गया था।

गिरफ्तारी और मुकदमा

अशोक महतो गिरोह में पिंटू महतो जैसे गैंगस्टर शामिल थे, जिन पर तीन पुलिस अधिकारियों और कांग्रेस राजनेता राजो सिंह की हत्या सहित लगभग तीस हत्याओं और अपहरण का आरोप था । पिंटू महतो वारिसलीगंज और शेखपुरा , नवादा जिले में अशोक महतो गिरोह के लिए जिम्मेदार था। महतो गिरोह में शारदा यादव भी शामिल था , जिसे अपसहर गांव में 11 उच्च जाति के लोगों के नरसंहार और लूटपाट और अपहरण का दोषी ठहराया गया था। यादव को 2003 में नौ अन्य सहयोगियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। "अरियारी" पुलिस को महतो गिरोह के शार्पशूटर बच्चू महतो को गिरफ्तार करने में भी सफलता मिली। महतो को 2006 में गिरफ्तार किया गया था, जब वह अदालत जा रहा था यह घटना विवादास्पद साबित हुई और क्षेत्र की पिछड़ी जातियों ने इसे भूमिहारों का विरोध करने वाले गैंगस्टर को दी गई सज़ा के रूप में देखा। महतो को पिछड़ी जातियों का काफ़ी समर्थन प्राप्त था ; उनके सार्वजनिक अपमान ने कुछ ऐसे सवाल खड़े किए; "क्या पुलिस किसी ऊँची जाति के गैंगस्टर को इसी तरह अपमानित कर सकती है?"

अदालत में पेशी के बाद, पुलिस अधीक्षक अमित लोढ़ा ने कहा कि महतो ने राजो सिंह की हत्या में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली है । हालाँकि, महतो ने जदयू नेता राजीव रंजन सिंह के साथ अपने संबंधों और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों का ज़िक्र किया । अदालत और पुलिस ने इन दावों को गंभीरता से नहीं लिया। विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी ने इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग की और ललन सिंह से इस्तीफ़ा देने को कहा। मुख्यमंत्री विपक्ष के दबाव में आ गए।

2013 में, शेखपुरा की एक अदालत ने राजो सिंह की हत्या के लिए अशोक महतो, शंभू यादव और अनिल महतो को बरी कर दिया। वादी को शेखपुरा के पूर्व कांग्रेस नेता की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था, लेकिन सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया गया था। 2022 में, राजो सिंह हत्याकांड में पिंटू महतो को भी बरी कर दिया गया। कुछ समाचार रिपोर्टों के अनुसार, मामलों में बरी होने के बाद, पिंटू महतो बाद में सक्रिय राजनीति में शामिल हो गया और जनता दल (यूनाइटेड) का सदस्य बन गया । उसकी पत्नी ने बिहार विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 2022 में, राजो सिंह के पोते और जेडीयू के विधान सभा सदस्य सुदर्शन सिंह ने अदालत में स्वीकार किया कि वह मामले को आगे नहीं ले जाना चाहते उन्होंने राजो सिंह की हत्या के मामले में अशोक चौधरी , रणधीर कुमार सोनी ( शेखपुरा के पूर्व विधायक ), गैंगस्टर अशोक महतो, राजद नेता लट्टू यादव और मुनेश्वर यादव समेत 11 लोगों को आरोपी बनाया था। उसी साल जून में, शेखपुरा की एक अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

हिंसा की महत्वपूर्ण घटनाएँ

मानिकपुर हत्याकांड
बिहार के शेखपुरा ज़िले के मानिकपुर गाँव में जवाबी कार्रवाई में महतो गिरोह ने सात लोगों को गोली मार दी। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि यह घटना उसी गाँव में पहले हुई चार लोगों की हत्याओं का बदला लेने के लिए की गई थी। सूत्रों के अनुसार, इन झड़पों में क्षेत्र में 16 लोगों की हत्याएँ हुईं। अखिलेश सिंह और अशोक महतो के बीच गैंगवार इन हमलों और जवाबी हमलों का कारण था।

2003 महदीपुर-झौर मोर हत्याकांड
2003 में, नवादा ज़िले के दरियापुर-पश्चिम टोला में, अशोक महतो के समर्थकों सात दलितों की कथित तौर पर महतो के प्रतिद्वंद्वियों ने हत्या कर दी थी। इन हत्याओं के जवाब में, वारिसलीगंज थाना क्षेत्र के महादीपुर-झौर मोड़ में कुर्मियों ने पाँच भूमिहारों की हत्या कर दी।

शेखपुरा विधायक पर दुर्घटना का आरोप
2012 में, शेखपुरा विधानसभा क्षेत्र से बिहार विधान सभा के तत्कालीन सदस्य रणधीर कुमार सोनी और शेखपुरा की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अनुसिया रणसिंह साहू ने आरोप लगाया कि महतो गिरोह एक दुर्घटना में विधायक की हत्या की साजिश रचने के लिए जिम्मेदार था। इस घटना में, यह बताया गया कि जेडीयू विधायक रणधीर कुमार सोनी महतो गिरोह के निशाने पर थे, जिसने विधायक को मारने के मकसद से उनके पैतृक घर के पास बम विस्फोट की साजिश रची थी। इस मामले के संबंध में, 2023 में, अशोक महतो को शेखपुरा की एक अदालत में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने और उनके गिरोह के एक अन्य आरोपी अभिजीत कुमार ने उनके खिलाफ आरोपों से इनकार किया था। यह भी बताया गया कि अदालत परिसर के भीतर, महतो को देखने के लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई, जिसे पुलिस ने अतिरिक्त बल प्रयोग करके खदेड़ दिया।

प्रखंड विकास अधिकारी  की हत्या
महतो और उसके गिरोह के सदस्य 2004 में शेखपुरा के अरियारी प्रखंड के प्रखंड विकास अधिकारी अशोक राज वत्स की हत्या के भी आरोपी थे। 2022 में, अदालत ने सबूतों के अभाव में पिंटू महतो को इस मामले में बरी कर दिया। इससे पहले एक अन्य अदालत ने अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया था, जिनमें अधिकारी के सहयोगी रघुवीर मंडल भी शामिल थे, जिन्हें जाँच शुरू होने के बाद आरोपी बनाया गया था। 

2018 में, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी अमित लोढ़ा, जो पिंटू महतो की गिरफ्तारी के समय शेखपुरा में तैनात थे, ने "बिहार डायरीज़" नामक एक किताब लिखी; हालाँकि किताब में उनका नाम नहीं है, मीडिया रिपोर्ट्स कहानी को पिंटू महतो के जीवन से मिलाती हैं। 2022 में, खाकी: द बिहार चैप्टर नामक एक नेटफ्लिक्स वेब सीरीज़ ने अशोक महतो गिरोह के शार्पशूटर पिंटू महतो की कहानी को चित्रित किया, जिससे विवाद हुआ, क्योंकि बिहार सरकार ने कथित तौर पर आईपीएस अमित लोढ़ा के खिलाफ अपने पद का दुरुपयोग करने और भ्रष्ट आचरण में लिप्त होने का मुकदमा दायर किया। जिसके बाद, लोढ़ा को एक मौजूदा सरकारी अधिकारी रहते हुए नेटफ्लिक्स के साथ अपने वाणिज्यिक सौदे के लिए निलंबित कर दिया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, अशोक महतो राज्य के कई हिस्सों में नायक माना जाता है, क्योंकि बताया जाता है कि उन्होंने उच्च जातियों के खिलाफ युद्ध के दौरान अपने प्रभाव क्षेत्र में कई पिछड़ी जातियों की मौत का बदला लिया था। पिंटू महतो, जिनके जीवन पर वेब श्रृंखला आधारित बताई जाती है, ने भी आईपीएस लोढ़ा पर उन्हें और एक विशेष समुदाय को बदनाम करने का आरोप लगाया।

2023 में, वारलिसगंज में "कुर्मी महापंचायत" नामक एक निकाय की बैठक में , जिसमें स्थानीय नेताओं और जिला परिषद के कुछ सदस्यों ने भाग लिया था , अशोक महतो की रिहाई की माँग की गई। उपस्थित लोगों ने इस संबंध में विधान सभा सदस्यों और सरकार के उच्च स्तर तक एक प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया।

फरवरी 2023 में, कुछ अखबारों की रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि अशोक महतो की रिहाई का समर्थन पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने किया था, जिन्होंने महतो को बरी करने के विचार का समर्थन करने के लिए पैरोल के नियम के तहत अन्य अपराधियों को दी जाने वाली छूट का हवाला दिया था । 

बाद में
अशोक महतो 17 साल की कैद काटने के बाद 2023 में जेल से रिहा हुए। 2024 में, उन्होंने अनीता देवी से अंतर्जातीय विवाह किया क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल ( RJD) नेतृत्व ने उन्हें 2024 के आम चुनावों में मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का चुनाव चिन्ह देने का वादा किया था। इसके बाद, लालू प्रसाद यादव ने 2024 के लोकसभा चुनावों में ललन सिंह के खिलाफ मुंगेर निर्वाचन क्षेत्र से अपनी पत्नी अनीता देवी को मैदान में उतारा।

सोर्स: विकिपीडिया

Monday, 8 September 2025

त्रिवेणी संघ (1933): साकेत बिहारी शर्मा

 

 

➟ आइये इस लेख में विभिन्न जातीय महासभाओं के दौर से उबरे उस त्रिवेणी संघ की चर्चा करेंगे जिसका व्यापक प्रभाव तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्तिथि पर पडा था और आज भी कहीं न कहीं उपरी पिछडी जातियों के बीच सत्ता संघर्ष और  गोलबंदी के रुप में परिलक्षित होता है।


☞☞ त्रिवेणी संघ (1933)
✧ आजादी के पहले एक नई लहर बिहार में घटित होते देखी जा रही थी, वह बिहार तक ही सीमित नहीं रही। एक के बाद और  एक जाति संघ बनाये जाने लगे थे: कायस्थ सभा (1887), भूमिहार ब्राह्मण महासभा (1889), ब्राह्मण सभा (1906), राजपूत सभा (1906), मारवाडी युवजन सभा (1907), दुसाध सभा (1911), गोप जात्य महासभा (1912), केवट सभा (1912), कुर्मी सभा (1912) और  कुशवाहा महासभा (1914)। भूमिहार ब्राह्मण महासभाओं में तत्कालीन रजवाडों और  जमींदारों की संख्या ज्यादा थी।1920 में भूमिहारों के चार प्रमुख संगठन सक्रिय थे। भूमिहार ब्राह्मण सभा, गया जो टेकारी राज के अंतर्गत था, उसके प्रेसिडेंट राजा हरिहर प्रसाद सिंह थे। इस्लामपुर के बाबु जगेश्वर प्रसाद सिंह के यहाँ 1899 में भूमिहार ब्राह्मण सभा, मुजफ्फरपुर की स्थापना की गयी थी। इसके 65 सदस्यों में अध्यक्ष राजा शिवराज नंदन सिन्हा और  सचिव बाबु किशुन प्रसाद सिंह शामिल थे। पटना भूमिहार ब्राह्मण सभा की स्थापना 1899 में पिरबहोर, पटना में की गयी थी जिसका नेतृत्व महाराजा हथुआ, राजा शिवहर, राजा अमावाँ, आदि कर रहे थे। इसी तरह सारण जिले में 1908 में महाराज बहादुर, हथुआ के द्वारा भूमिहार ब्राह्मण सभा की स्थापना की गयी। 


✧ जनेऊ पहनने के लिये हुये आंदोलन ने पिछडी जातियों में एकता लाने का काम कर किया था।यह समाज में ऊँची जातियों के बराबर दर्जा हाँसिल करने के लिये प्रतिकात्मक रुप में आरम्भ किया गया था जिसे ‘Sanskritization’ के नाम से भी जाना जाता है।ठीक 1920 तक यादवों, कुर्मियों और  कोईरियों ने, जो पिछडी जाति में बेहतर हैसियत वाले थे, उन्होंने जमींदारों के खिलाफ प्रतिरोध का झंडा उठा लिया। उसके त्रिवेणी मुकाम पर जातीय संगठनों में, यादव क्षत्रिय सभा, कुर्मी क्षत्रिय सभा और  कोइरी क्षत्रिय सभा शाहाबाद जिले (वर्तमान में भोजपुर) में एक साथ प्रकाश में आयीं और  इन्होंने जिस क्षतरी का निर्माण 30 मई, 1933 को किया, उसे त्रिवेणी संघ कहा गया। पिछडी जातियों के उच्च हिस्से द्वारा स्थापित किए गये इस त्रिवेणी संघ की माँग थी सामाजिक स्वाभीमान की, मूल मकसद था, “इज्जत की लडाई”।इसे एक प्रतिरोधी कार्यवाई के रुप में स्थापित करने के लिये एक सम्मेलन बर्मा तक में आयोजित किया गया, इस बात की परिकल्पना भी की गयी कि कैसे मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और  धार्मिक साम्राज्यवाद का नाश हो।अपने निर्माण के दो साल के भीतर ही त्रिवेणी संघ ने पिछडी जाति के दो लाख लोगों को अपना सदस्य बना चुकी थी। इस संघ ने यह नारा दिया, “जमीन उसकी है, जो इसे जोतता बोता है”। एक विशेष जगह जहाँ यह अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका था, वहाँ चुनावी प्रक्रिया चल रही थी।बीते समय 1927 से 1933 के बीच शाहाबाद जिले में परिषद के चुनाव में पिछडी जाति का मात्र एक उम्मीदवार ही चुनाव जीत सका था। त्रिवेणी संघ के गठन के बाद से ही 30/40 सदस्यों वाली परिषद में एक से ज्यादा सीटों पर पिछडी जातियों की जीत की शुरुआत हुई। त्रिवेणी संघ के खुले परिदृश्य में आने से मुकाबला पिछडी जातियों और  अगडी जातियों के संघर्ष में बदल गया था और  भभुआ परिषद के चुनाव में 2/5 (यानि 40 फीसदी) सीटें जीतीं। इसमें सारे मत जातीय संगठन के नाम पर हाँसिल कीये थे (अब आप तय कर लें कि जाति को राजनैतिक हथियार सर्वप्रथम किसने बनाया, यह जहर किसने फैलाया)। सांगठनिक और  आर्थिक संसाधनों की कमी के वजह से त्रिवेणी संघ 1933 का चुनाव तो हार गया, लेकिन रामराज सिंह के शब्दों में उनका मानना था, “वोट से भले हार गये, लाठी से नहीं हारे”, इसका अर्थ यह था कि हम वोट से जीत नहीं सके तो क्या हमारी लाठी में अभी भी दम है। शाहाबाद में त्रिवेणी आश्रम के निर्माण से इसके विस्तार में मदद मिली जिससे इसका फैलाव शाहाबाद से पटना, गया और  भागलपुर जिलों तक हो गया।

 
✧ 1939 में त्रिवेणी संघ और  अन्य पिछडी जातियों के संगठनों ने पिछडी और  दलितों के लिये रोजगार में आरक्षण की मांग उठा दी। 1952 में बिहार विधान सभा में पिछडी जातियों को आरक्षण दिलाने के लिये एक अध्यादेश प्रस्तावित किया गया। तब भारतीय संविधान ने दलितों का आरक्षण पहले से ही लागु कर रखा था। भले ही अध्यादेश पारित न हो सका, फिर भी इन जातियों ने अपने शक्ति प्रदर्शन के जरिये संघर्ष भूमि तयार कर ली थी। 40 साल बाद भी इन जातियों ने नारा बुलंद किया, “सौ में नब्बे पिछडे हैं तो नब्बे हिसा लेके रहेंगे”। जबकि सामाजिक खाई को गहराने से रोकने के लिये कुछ अगडे समूहों द्वारा यह भी नारा दिया गया, “फारवर्ड-हरिजन भाई भाई, पिछडी जाति कहाँ से आई”।यह विचार प्रवाह 1990 के मंडल कमीशन की रिपोर्ट और  अनुयोदन के प्रस्ताव के बाद तक जारी रहा और  इसने फिर एक बार अगडों और  पिछडों के ध्रवीकरण की भूमि तयार कर दी। 


✧ त्रिवेणी संघ ने पिछडी जातियों के सामाजिक रुप से चेतनशील बुद्धजीवियों जैसे यदुनंदन मेहता और  सरदार जगदेव सिंह के लिये मंच मुहैया किया ताकि पिछडी जातियाँ एक होकर लडें। बाद में इसे आगे बढाने में राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की भी भूमिका रही। त्रिवेणी संघ ने 1940 में एक पत्रिका छापनी शुरु की जिसका नाम था - THE TRUMPET OF TRIVENI (त्रिवेणी की तुरही)। इसके माध्यम से संघ अपनी बातों को और  मजबूती से उठाने के लिये अग्रसर हुआ।


✧ त्रिवेणी संघ ने अपनी कार्ययोजना में विभिन्न मसलों को शामिल किया। ये मुद्दे गाँवों की पुनर्संरचना, पंचायतों की सक्रियता, निरक्षरता के उन्मूलन, पुस्तकालय खोले जाने, अखाडों की स्थापना, स्वास्थ्य-सफाई को प्रमुखता देना,, उत्पादन बढाने के लिये खाद का प्रयोग, घरेलु उद्योग लगाने, सहकारी समितियाँ बनाने आदि से जुडी थीं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये ग्रामीण और  अन्य स्तरों पर स्वयंसेवी सेवाएँ बनायी गयीं जिन्हें त्रिवेणी सेना दल कहा गया। त्रिवेणी संघ ने शाहाबाद क्षेत्र में कुछ उद्देश्यों में सफलता हांसिल करने में सफल तो हुई पर 1945 में इसमें बिखराव आने लगा। इसके नेताओं के बहुत बडे हिस्से ने अपने आप को कांग्रेस से जोड लिया, जबकि अन्य सदस्य ‘Radical Democratic Party’ से जुड गये। इसके ठीक बाद इनमें से अधिकांश लोग राम मनोहर लोहिया की बनायी गयी ’Socialist Party’ के सदस्य बन गये। 


✧ त्रिवेणी संघ में एक शक्तिशाली सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन के रुप लेने की भरपुर क्षमता थी लेकिन अपने अतिवादी राजनैतिक मुद्दों के वजह से अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। उस दौर की लडाई के दौर में भाग ले चुके केसरी महतो की टिप्पणी थी, “हमारा एक संगठन था, हमारे अपने गीत थे, अपने नारे थे लेकिन हम हार गये। बहुत सारे नेताओं ने अपने आप को कांग्रेस पार्टी को बेच दिया।” 


❆ हालाँकि त्रिवेणी संघ कोई गहरी पैठ बनाने में असफल हो गयी लेकिन इसके प्रयास बेकार नहीं गये। शाहाबाद क्षेत्र जहाँ त्रिवेणी संघ ने विद्रोह की शुरुआत की, वही शाहाबाद बाद में नक्सल चरमपंथ का मुख्य केंद्र बनकर उभरा। इसी शाहाबाद ने जगदीश महतो और  रामेश्वर अहीर को पैदा कर दिया जिसने जातीय उन्माद को हिंसक रुप दे दिया।
 
✍️ संकलनकर्ता - साकेत बिहारी शर्मा

Saturday, 6 September 2025

अरवल विधानसभा पर भूमिहारों की दावेदारी का इतिहास: साकेत बिहारी शर्मा

 

अरवल विधानसभा पर भूमिहारों की दावेदारी आजादी के बहुत बाद 1977 में जाकर बनी और उसका श्रेय बाणेश्वर सिंह, अख्तियारपुर (पालीगंज) के स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह उर्फ ‘सरदार जी’ और उनके वीर भाई जिन्होंने कंधा से कंधा मिला कर वामपंथी उग्रवादियों के खिलाफ़ जंग छेड़ा, चंद्रभूषण बाबु(गया जिला परिषद के पूर्व अध्यक्ष), रघुराज बाबु (लोकल बोर्ड के चेयरमैन), नुनु चंद्र भास्कर जी को जाता है,

स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह को इस क्षेत्र के किसान याद करते हुये कहते हैं, “सोन से निकली नहरो मे जब भी पानी की कमी होती थी तो कैम्प कर वे पानी खुलवाते थे.. यही कारण है कि उन्हे लगातार तीन बार उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला”, इस कृषि प्रधान क्षेत्र में आज भी नहरों का जीर्णोद्धार व पक्कीकरण प्रमुख समस्या बना हुआ है…..कालांतर में शूरमाओं में गिने जाने वाले कई इनसे कनिष्ठ रहे हैं, आज के तारीख में जहानाबाद लोक सभा के अंतर्गत यह एक बेहतरीन सीट है और कई पार्टियों के कई दावेदार यहाँ से टिकट के लिए इच्छुक रहते हैं, अब बात की जाए इस सीट के राजनीतिक यात्रा की: 
 
- पहली बार यह सीट हमारे पास बनेश्वर प्रसाद सिंह जी के माध्यम से खाते में आई जो 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, उन्हें कुल 35,926 मत प्राप्त हुए थे और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राम भवन सिंह को 12,072 मतों के अंतर से पराजित किया था;
 
- मई 1980 के चुनाव में कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह बतौर निर्दलीय 20,744 मतों के साथ विजयी हुए, उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा गुट) के देव कुमार शर्मा (D K Sharma) को कड़े मुकाबले में 1437 मतों के अंतर से पराजित किया;
 
- मई 1985 के चुनाव में अपने विजय यात्रा को आगे बढ़ाते हुए लगातार दूसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह ने रिकॉर्ड 65,621 मतों के साथ कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे राम प्रसाद ओझा को 34,747 मतों के भारी अंतर से पराजित किया, यह उनके करियर का सबसे शानदार जीत रहा, इस चुनाव में कुल 20 उम्मीदवार मैदान में थे;
 
- एक बार फिर फरवरी, 1990 के चुनाव में स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह, बतौर निर्दलीय तीसरी बार 38,902 मतों के साथ इस सीट से विधायक चुने गए, उन्होंने Indian People’s Front यानि IPF के टिकट पर लड़ रहे रामाधार सिंह को 5,272 मतों के अंतर से पराजित किया, इस चुनाव में कुल 29 उम्मीदवार मैदान में थे;
 
- 1995 के चुनाव में स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह, भारतीय प्रगतिशील पार्टी के टिकट पर एक बार फिर से मैदान में उतरे लेकिन महज 13,442 मतों के साथ तीसरे स्थान पर सिमट गये;
 
- 2000 के चुनाव में फिर हमारी वापसी हुई जब राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर पूर्व मंत्री व वर्तमान राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह जी ने 29,298 मतों के साथ CPI(ML)(L) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे शाह चाँद को कड़े मुकाबले में 2,261 मतों के अंतर से परास्त किया, स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह ने भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई व Bihar People’s Party के टिकट पर 10,507 मतों के साथ वह चौथे स्थान पर रहे;
 
- फरवरी 2005 के चुनाव में इस सीट पर हम रेस से बाहर हो गए थे जब पहले व दूसरे स्थान पर क्रमशः LJP और RJD रही, इस सीट पर स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह के बेटे रंजीत कुमार उर्फ ‘रिंकू’, जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर 18,929 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे;
 
- अक्टूबर 2005 के चुनाव में भी स्वर्गीय कृष्ण नंदन प्रसाद सिंह जी के बेटे रंजीत कुमार उर्फ ‘रिंकू’ भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 25,371 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, हार का अंतर 8,439 महज मतों का था;
 
- 2010 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ग्राम-नीमा, पटना के रहने वाले चितरंजन कुमार जी ने 23,984 मतों के साथ अपने निकटतम प्रतिद्वंदी CPI(ML)(L) के टिकट पर लड़ रहे महानंद प्रसाद जो कि वर्तमान विधायक है, को 4,202 मतों के अंतर से परास्त किया और यह सीट वापस हमारे पाले में आ गया;
 
- 2015 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे चितरंजन कुमार 37,485 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे व हार का अंतर 17,810 वोटों का था;
 
- 2020 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लड़ रहे श्री दीपक कुमार शर्मा (ग्राम- बम्भई, जिला- अरवल) 48,336 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, हालाँकि मजबूत ध्रुवीकरण के कारण हार-जीत का अंतर 19,950 वोटों का था, फिर भी अभी तक किसी भी भाजपा या जदयू उम्मीदवार द्वारा हासिल किया गया यह सबसे ज्यादा मत हैं जिससे स्पष्ट है कि भविष्य में भी हमारी इस सीट पर मजबूत दावेदारी रहेगी;
 
= संकलन: साकेत बिहारी शर्मा

Thursday, 4 September 2025

2024 जहानाबाद लोक सभा चुनाव में अरवल विधान सभा (Form 20 आधारित) के सभी बूथों की स्थिति

 

>> 2024 जहानाबाद लोक सभा चुनाव में अरवल विधान सभा (Form 20 आधारित) के सभी बूथों की स्थिति:

सोनबरसा पंचायत की स्थिति 

बूथ संख्या 1 से 9 तक 
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सभी नौ बूथों पर राजद+ 2024 लोक सभा में आगे रहा। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को भी कुल 152 वोट इस पंचायत से मिला है।
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सकरी पंचायत की स्थिति
बूथ संख्या 10 से 18 तक
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2024 लोक सभा में राजद+ यहां पांच बूथों पर आगे रहकर भी कुल मिलाकर जदयू+ से 50 वोटों से पीछे रहा, 
अरुण बाबू को यहां कुल 388 वोट मिला जिसमें अहियापुर बूथ संख्या 17+18 पर कुल 168 वोट, व बूथ संख्या 12,13,14 पर कुल 110 वोट प्राप्त हुआ है। 
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वासिलपुर पंचायत की स्थिति
बूथ संख्या 19 से 25
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2024 लोक सभा में इस पंचायत से राजद+ को करीब 1800 वोटों का बंपर लीड मिला। 
कुल मिलाकर यह राजद गठबंधन का गढ़ है।
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फखरपुर पंचायत
बूथ संख्या 28 से 35
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राजद+ इस पंचायत से करीब 1600 वोटों से लीड किया है। 
बूथ संख्या 34 (गद्दोपुर) में अरुण बाबू सबसे आगे हैं, उन्हें 332 वोट अकेले इस बूथ पर मिला है। बूथ संख्या 28 पर बसपा को 55 वोट मिला, कुल मिलाकर अरुण बाबू को 465 वोट मिला इस पंचायत से।
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भदासी पंचायत
बूथ संख्या 36 से 43 तक
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राजद+ का कुल लीड करीब 800 वोट,
अरुण बाबू को बूथ संख्या 43 (जलपुरा) पर 178 वोट मिला है, कुल बसपा को 271 वोट। 
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अरवल सिपाह पंचायत
बूथ संख्या 44 से 51
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राजद+ 2024 लोक सभा में 200 वोटों के मामूली अंतर से लीड किया (1840- 1632),
यहां से अरुण बाबू को 101 वोट कुल मिला है।
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प्यारेचक पंचायत
बूथ संख्या 52 से 59
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2024 लोक सभा में राजद+ को यहां लगभग 1200 वोटों का बढ़िया लीड मिला है (2285-1077)। 
अरुण बाबू को इस पंचायत से 212 वोट मिला है।
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मखदुमपुर पंचायत
बूथ संख्या 26, 27, व 60 से 69
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मखदुमपुर पंचायत में 2019 लोक सभा चुनाव में राजद+ को करीब 2100 वोटों का बंपर लीड यहां से मिला है। सभी बूथों पर बढ़त है राजद+ को। 
राजद व सीपीआई माले का यह पंचायत गढ़ है। 
अरुण बाबू को इस पंचायत से 367 वोट मिला है।
मखदुमपुर पंचायत के बूथ संख्या 26 पर अरुण बाबू को 117 वोट मिला है।
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मुरादपुर हुजरा पंचायत
बूथ संख्या 70 से 76
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यह पंचायत जिसके अंतर्गत बैदराबाद आता है, भाजपा का परंपरागत गढ़ है, 2024 लोक सभा में यहां से जदयू+ को करीब 1700 वोटों का बढ़त प्राप्त हुआ है, सभी बूथों पर लीड है।
अरुण बाबू को यहां से भी कुल 170 वोट मिला है।
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अमरा पंचायत 
बूथ संख्या 77 से 85 तक 
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2024 लोक सभा में करीब 20 वोटों का मामूली लीड राजद+ को मिला,
अरुण बाबू को इस पंचायत से भी कुल 162 वोट मिला है।
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अबगीला पंचायत
बूथ संख्या 86 से 95
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2024 लोक सभा में राजद+ को यहां से 1000 वोटों का करीब लीड मिला, 
बूथ संख्या 90 (गौरा) पर एक भी वोट poll नहीं हुआ है 2024 में।
अरुण बाबू को इस पंचायत से भी 220 वोट मिला है।
बूथ संख्या 88 (इटवाँ) पर अरुण बाबू को 72 वोट मिला है।
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रामपुर वैंना पंचायत
बूथ संख्या 96 से 102
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2024 लोक सभा चुनाव में राजद+ को यहां से 1000 वोटों का लीड मिला, 
अरुण बाबू को कुल यहां 651 वोट मिले और बूथ संख्या 102 (सैदपुर टोला, अंजान बीघा) में सबसे ज्यादा 400 वोट उन्हें प्राप्त हुए हैं।
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परासी पंचायत
बूथ संख्या 103 से 109
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2024 लोक सभा में जदयू+ को 50 वोटों की मामूली बढ़त मिली है, 
अरुण बाबू को यहां से 191 वोट मिले हैं।
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खभैनी पंचायत
बूथ संख्या 110 से 118 तक
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2024 में राजद गठबंधन सभी बूथों पर यहां से लीड किया है। 
अरुण बाबू को इस पंचायत से भी 243 वोट मिला है। 
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सरौती पंचायत
बूथ संख्या 119 से 126
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2024 लोक सभा में राजद+ करीब 150 वोटों के अंतर से लीड किया। यहां सभी बूथों पर राजद+ और एनडीए में टक्कर दिखता है। 
बूथ संख्या 123 (रामपुर चौरम) पर अरुण बाबू को सभी से ज्यादा 167 वोट मिला है, कुल वोट 391 मिला है बसपा को यहां इस पंचायत से।
बसपा को बूथ संख्या 119 (सरौती) पर 72 वोट और राणापुर, बूथ संख्या 122 पर 67 वोट मिला है।
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कामता पंचायत
बूथ संख्या 127 से 134
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2024 के चुनाव में राजद+ यहां से भी करीब 150+ वोटों से लीड किया है, 
बसपा अरुण बाबू को यहां से कुल 244 वोट मिला है।
स्पष्ट है, कामता पंचायत में बाभन एनडीए मय रहा
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सकरीखुर्द पंचायत 
बूथ संख्या 135 से 140
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2024 लोकसभा के चुनाव में जदयू गठबंधन यहां से करीब 500 वोटो से लीड करता हुआ दिख रहा है, 
कुल मिलाकर एनडीए डोमिनेटेड पंचायत है।
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बलिदाद पंचायत
बूथ संख्या 141 से 147
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2024 लोक सभा के चुनाव में राजद+ को यहां से करीब 1000 वोटों का लीड मिला है, 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 95 वोट मिला है। 
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इंजोर पंचायत
बूथ संख्या 148 से 155
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इंजोर पंचायत के सभी बूथों पर 2024 लोकसभा चुनाव में टक्कर दिखाई देती है।
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को कुल 292 वोट प्राप्त हुए हैं, जिसमें पाठक बीघा, गोइंद, कलंदरा, खैरा के बूथ शामिल हैं, रूपाइच बूथ पर उन्हें 30 वोट मिला है।
इनजोर पंचायत में अरुण बाबू का फैक्टर एनडीए को मिल सकने वाला lead खत्म कर दिया..
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उसरी पंचायत
बूथ संख्या 156 से 163 तक 
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2024 लोकसभा चुनाव में राजद गठबंधन इस पंचायत से करीब 100 वोटो से पीछे रहा।  
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को 2024 लोकसभा में कुल 416 वोट मिला है जिसमें हरदियां के बूथ संख्या 156 व 157 पर क्रमशः 41 और 48 वोट मिला है, वहीं बूथ संख्या 159 (उसरी) पर 154 वोट व उसरी चकिया, उसरी बाजार के बूथ संख्या 161 पर 106 वोट मिला है। 
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जयपुर पंचायत
बूथ संख्या 164 से 171 तक 
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2024 लोकसभा चुनाव में राजद गठबंधन 500+ वोटों से इस पंचायत से लीड किया है जबकि 2019 के चुनाव में जदयू गठबंधन करीब 200 वोटो से यहां से लीड किया था जबकि 2020 विधानसभा चुनाव में सीपीआई माले करीब 800 वोटो से यहां से लीड किया था।
बूथ संख्या 165 (रामपुर कोनी) पर राजद गठबंधन को 2024 लोकसभा चुनाव में एकतरफा लीड मिलता हुआ दिखता है, बाकी सभी बूथों पर टक्कर है। रामपुर कोनी में पासवान और यादव आबादी ज्यादा है।
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को सवजपुरा व जयपुर के सम्मिलित बूथों 166, 167, 168 पर क्रमशः 185, 137 व 67 वोट मिला है। बूथ संख्या 169 ((जयपुर) टोला सवजपुरा) व 170 (बख्तर) पर अरुण बाबू को क्रमशः 78 व 74 वोट मिला है। अरुण बाबू को कुल 567 वोट इस पंचायत से मिला है
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पहलेजा पंचायत 
बूथ संख्या 172 से 177 व बूथ संख्या 184 
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2024 लोकसभा के चुनाव में जदयू गठबंधन को यहां से करीब 650 वोटो का लीड मिला। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 809 वोट मिला है, जिसमें बूथ संख्या 173 (पहलेजा टोला, करण बीघा एवं पहलेजा) पर 87 वोट, बूथ संख्या 174 व 175 (बोध बीघा) पर क्रमशः 146 व 88 वोट, बूथ संख्या 177 (मेहंदिया) पर 227 वोट व बूथ संख्या 184 (तुर्क खरसा, नाथ खरसा) पर 211 वोट मिला है।
बूथ संख्या 173, 177 व 184 पर एनडीए या बसपा का एकतरफा दबदबा दिखता है।
यहां भी अरुण बाबू का फैक्टर एनडीए को डायरेक्ट डैमेज करते हुए दिख रहा है।
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इसमाइलपुर कोयल पंचायत बूथ संख्या 178 से 183 
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2024 लोकसभा में जदयू गठबंधन यहां से 22 वोटो के मामूली अंतर से लीड कर रहा है,
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 193 वोट मिला है जिसमें कोयल भूपत के बूथ संख्या 178 व 179 पर कुल 101 वोट मिला है।
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सोहसा पंचायत 
बूथ संख्या 185 से 191 
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2024 लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को करीब 900 वोटो का यहां से बड़ा लीड प्राप्त हुआ है। एनडीए यहां के सभी बूथों पर लीड करते हुए देखा जा सकता है।
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को मात्र कुल 171 वोट मिला है जबकि इस पंचायत में भूमिहार आबादी है, स्पष्ट है कि यहां के भूमिहारों ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया है।
आशुतोष कुमार को सोहसा पंचायत के बूथ संख्या 188 व 189 पर (दोनों राज खरसा का बूथ है), क्रमशः 99 व 158 वोट मिला है जो की कुल मिलाकर 257 होता है।
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मैंनपुरा पंचायत 
बूथ संख्या 192 से 200 तक 
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2024 लोकसभा चुनाव में राजद गठबंधन यहां से करीब 50 वोटो से लीड करता दिखता है। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 372 वोट मिला है जिसमें बूथ संख्या 192 (मैनपुरा) पर 179 वोट व (लोदीपुर, मूसेपुर) बूथ संख्या 198+199 पर 94 वोट उल्लेखनीय है।
इस पंचायत में अरुण बाबू का फैक्टर एनडीए को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है।
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बेलसार पंचायत
बूथ संख्या 201 से 209 तक 
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2024 लोकसभा चुनाव में राजद गठबंधन को 300 वोटो की मामूली बढ़त प्राप्त हुई है (2165 - 1867)। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को कल 173 वोट इस पंचायत से मिला है जिसमें बूथ संख्या 204 (बेलसार) पर 83 वोट उल्लेखनीय है। 
इस पंचायत में भी भूमिहारों की आबादी है और स्पष्ट रूप से यहां भूमिहारों का एनडीए के प्रति झुकाव दिखता है।
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टेरी पंचायत 
बूथ संख्या 210 से 217 तक 
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परंपरागत रूप से यह पंचायत राजद गठबंधन का गढ़ है, 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को कुल मिलाकर यहां से 167 वोट मिला है।
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बेलांव पंचायत 
बूथ संख्या 218 से 222 
2024 लोकसभा के चुनाव में राजद गठबंधन को यहां से करीब 500 वोटो का बढ़त प्राप्त हुआ है, 
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उत्तरी कलेर पंचायत 
बूथ संख्या 223 से 230 तक 
परंपरागत रूप से यह पंचायत राजद व सीपीआई माले का गढ़ है। 2024 लोकसभा में राजद गठबंधन को करीब 1600 मतों का बढ़त यहां से प्राप्त हुआ है।
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दक्षिणी कलेर पंचायत 
बूथ संख्या 231 से 239 तक 
2024 लोकसभा के चुनाव में करीब 400+ वोटो का अच्छा बढ़त RJD गठबंधन को यहां से प्राप्त हुआ है। 
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बेलखरा पंचायत 
बूथ संख्या 240 से 245 तक 
2024 लोकसभा चुनाव में जदयू+ को यहां से करीब 20 वोटो की मामूली बढ़त प्राप्त हुई है। 
2024 के चुनाव में बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को कल 184 मत प्राप्त हुए हैं जिसमें बेलखारा के बूथ संख्या 243 और 244 पर क्रमशः 70 व 51 वोट मिले हैं। 
यहां भी अरुण बाबू का फैक्टर एनडीए को नुकसान पहुंचाता दिख रहा है।
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शहर तेलपा पंचायत 
बूथ संख्या 246 से 252 तक 
2024 लोकसभा के चुनाव में राजद गठबंधन को यहां से करीब 1000 वोटो की बढ़त प्राप्त हुई है।
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बम्भई पंचायत 
बूथ संख्या 253 से 258 तक 
परंपरागत रूप से यह पंचायत एनडीए को बढ़िया लीड देता आया है, 2024 लोकसभा चुनाव में भी जदयू गठबंधन को यहां से करीब 400 वोटो का बड़ा लीड प्राप्त हुआ है। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को कुल 238 मत इस चुनाव में मिले हैं जिसमें बम्भई बूथ संख्या 256 व 257 पर क्रमशः 83 व 67 वोट उल्लेखनीय है।
इस पंचायत ने ज्यादातर एनडीए के पक्ष में मतदान किया है॥ 
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केयाल पंचायत
बूथ संख्या 259 से 268 तक 
2024 लोकसभा चुनाव में राजद गठबंधन को इस पंचायत से करीब 250 वोटो की बढ़त प्राप्त हुई है। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 551 वोट मिले हैं जिसमें बूथ संख्या 261 (कुबडी), बूथ संख्या 262 (केयाल), बूथ संख्या 263 (केयाल, सुखी बीघा), बूथ संख्या 264 (केयाल, अंधराचक, पक्का मठ, पांडेचक) पर क्रमशः 97, 86, 158 व 74 मत प्राप्त हुए हैं जो उल्लेखनीय है। 
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रामपुर चाय पंचायत 
बूथ संख्या 269 से 274 तक 
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2024 लोकसभा के चुनाव में राजद गठबंधन को यहां से करीब 400 वोटो का बढ़त प्राप्त हुआ है। 
बसपा प्रत्याशी अरुण बाबू को इस पंचायत से कुल 165 वोट प्राप्त हुए हैं।
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Compiled by: Saket Bihari Sharma

Wednesday, 3 September 2025

NH-139 पर 2 साल बाद भी नहीं बनी फोरलेन: नितिन गडकरी के ऐलान पर 5500 करोड़ की मिली थी स्वीकृति

 
NH-139 पर 2 साल बाद भी नहीं बनी फोरलेन: नितिन गडकरी के ऐलान पर 5500 करोड़ की मिली थी स्वीकृति 

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी 2 साल पहले गया में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। इस दौरान बिहार झारखंड के बॉर्डर स्थित संडा से पटना तक जाने वाली एनएच-139 के फोरलेन बनाए जाने की घोषणा की गई थी। इसके लिए 5500 करोड़ रुपए की स्वीकृति देने की भी बात कही गई थी। इससे औरंगाबाद से पटना का सफर आसान हो जाता।


2 घंटे में ही लोग पटना पहुंच जाते। अभी 2 लेन है, फोरलेन होता तो लोगों को आसानी होती और जाम से मुक्ति मिलती। अभी जाम में लोगों को परेशानी होती है।

फिलहाल एनएच-139 के चौड़ीकरण की योजना अधर में लटक गई है। सासाराम से पटना तक बन रहे फोरलेन के कारण सड़क को एनएचएआई ने फोरलेन करने से फिलहाल इनकार कर दिया है। सासाराम से पटना जाने वाली सड़क को फोरलेन बनाया जा रहा है।

एनएचएआई ने मंत्रालय को तर्क दिया गया है कि सासाराम से पटना तक बन रही फोरलेन के समानांतर कोई नया फोरलेन नहीं बनाया जा सकता है। एनएच-139 पर भारी वाहनों का जो दबाव है वह सासाराम-पटना फोरलेन बनने के बाद इसपर हो जाएगा। इसके कारण एनएच-139 के चौड़ीकरण की योजना लटक गई है।

7 मीटर चौड़ी है सड़क

एनएच-39 आवाजाही के लिहाज से अत्यंत ही महत्वपूर्ण सड़क है। यह पटना से झारखंड के डाल्टनगंज तक जाती है। सड़क का जुड़ाव हुआ,छत्तीसगढ़ व अन्य राज्यों से भी है। सड़क से होकर प्रतिदिन 10000 से अधिक वाहनों का आवाजाही होता है। इतना महत्वपूर्ण सड़क होते हुए भी इसका चौड़ीकरण नहीं कराया जा रहा है।

आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं और लोगों को जान गवांना पड़ता है। एनएचएआई के अधिकारियों के अनुसार वर्तमान में एनएच-139 के चौड़ीकरण का कोई प्रस्ताव नहीं है। अभी यह सड़क सात मीटर चौड़ी है। कुछ जगहों पर 10 मीटर है। अधिकारी के अनुसार, औरंगाबाद के संडा से पटना के नौबतपुर तक इस सड़क को 10 मीटर चौड़ा किया जाता,तो सड़क दुर्घटना में कमी आती।

ब्लैक स्पॉट पर नहीं है सुरक्षा के व्यापक इंतजाम

मुख्य सड़क पर केंद्रीय और राजकीय मापदंड के अनुरूप ब्लैक स्पॉट निर्धारित किया गया है। लेकिन ब्लैक स्पॉट पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम नहीं किए गए हैं। साइन बोर्ड भी नहीं लगाया गया है। एनएच-139 पर चतरा मोड़, कारा मोड़, अरंडा, शंकरपुर, एरका, दोमुहान को ब्लैक स्पॉट घोषित किया गया है।

दुर्घटना में एक ही स्थल पर 10 से अधिक लोगों की मौत के बाद इस स्थल को केंद्रीय मापदंड के अनुरूप ब्लैक स्पॉट घोषित किया जाता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो औरंगाबाद में सबसे अधिक सड़क दुर्घटना इसी सड़क पर होती है। लोगों की मौत होती है।

इस साल जनवरी के महीने में 35 दुर्घटनाओं में 30 लोगों की मौत हुई है,जबकि 20 लोग घायल हुए हैं। इसी प्रकार फरवरी महीने में 47 दुर्घटना में 33 लोगों की जान गई है। 21 लोग घायल हुए हैं। मार्च महीना में हुई 33 घटनाओं में 27 लोगों की जान जा चुकी है। जबकि, अप्रैल महीने में 43 दुर्घटनाएं हुई है,आईने में 38 लोगों की मौत हुई है। सिर्फ चार महीना में 128 लोगों की मौत हुई है।