Monday, 8 September 2025

त्रिवेणी संघ (1933): साकेत बिहारी शर्मा

 

 

➟ आइये इस लेख में विभिन्न जातीय महासभाओं के दौर से उबरे उस त्रिवेणी संघ की चर्चा करेंगे जिसका व्यापक प्रभाव तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्तिथि पर पडा था और आज भी कहीं न कहीं उपरी पिछडी जातियों के बीच सत्ता संघर्ष और  गोलबंदी के रुप में परिलक्षित होता है।


☞☞ त्रिवेणी संघ (1933)
✧ आजादी के पहले एक नई लहर बिहार में घटित होते देखी जा रही थी, वह बिहार तक ही सीमित नहीं रही। एक के बाद और  एक जाति संघ बनाये जाने लगे थे: कायस्थ सभा (1887), भूमिहार ब्राह्मण महासभा (1889), ब्राह्मण सभा (1906), राजपूत सभा (1906), मारवाडी युवजन सभा (1907), दुसाध सभा (1911), गोप जात्य महासभा (1912), केवट सभा (1912), कुर्मी सभा (1912) और  कुशवाहा महासभा (1914)। भूमिहार ब्राह्मण महासभाओं में तत्कालीन रजवाडों और  जमींदारों की संख्या ज्यादा थी।1920 में भूमिहारों के चार प्रमुख संगठन सक्रिय थे। भूमिहार ब्राह्मण सभा, गया जो टेकारी राज के अंतर्गत था, उसके प्रेसिडेंट राजा हरिहर प्रसाद सिंह थे। इस्लामपुर के बाबु जगेश्वर प्रसाद सिंह के यहाँ 1899 में भूमिहार ब्राह्मण सभा, मुजफ्फरपुर की स्थापना की गयी थी। इसके 65 सदस्यों में अध्यक्ष राजा शिवराज नंदन सिन्हा और  सचिव बाबु किशुन प्रसाद सिंह शामिल थे। पटना भूमिहार ब्राह्मण सभा की स्थापना 1899 में पिरबहोर, पटना में की गयी थी जिसका नेतृत्व महाराजा हथुआ, राजा शिवहर, राजा अमावाँ, आदि कर रहे थे। इसी तरह सारण जिले में 1908 में महाराज बहादुर, हथुआ के द्वारा भूमिहार ब्राह्मण सभा की स्थापना की गयी। 


✧ जनेऊ पहनने के लिये हुये आंदोलन ने पिछडी जातियों में एकता लाने का काम कर किया था।यह समाज में ऊँची जातियों के बराबर दर्जा हाँसिल करने के लिये प्रतिकात्मक रुप में आरम्भ किया गया था जिसे ‘Sanskritization’ के नाम से भी जाना जाता है।ठीक 1920 तक यादवों, कुर्मियों और  कोईरियों ने, जो पिछडी जाति में बेहतर हैसियत वाले थे, उन्होंने जमींदारों के खिलाफ प्रतिरोध का झंडा उठा लिया। उसके त्रिवेणी मुकाम पर जातीय संगठनों में, यादव क्षत्रिय सभा, कुर्मी क्षत्रिय सभा और  कोइरी क्षत्रिय सभा शाहाबाद जिले (वर्तमान में भोजपुर) में एक साथ प्रकाश में आयीं और  इन्होंने जिस क्षतरी का निर्माण 30 मई, 1933 को किया, उसे त्रिवेणी संघ कहा गया। पिछडी जातियों के उच्च हिस्से द्वारा स्थापित किए गये इस त्रिवेणी संघ की माँग थी सामाजिक स्वाभीमान की, मूल मकसद था, “इज्जत की लडाई”।इसे एक प्रतिरोधी कार्यवाई के रुप में स्थापित करने के लिये एक सम्मेलन बर्मा तक में आयोजित किया गया, इस बात की परिकल्पना भी की गयी कि कैसे मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और  धार्मिक साम्राज्यवाद का नाश हो।अपने निर्माण के दो साल के भीतर ही त्रिवेणी संघ ने पिछडी जाति के दो लाख लोगों को अपना सदस्य बना चुकी थी। इस संघ ने यह नारा दिया, “जमीन उसकी है, जो इसे जोतता बोता है”। एक विशेष जगह जहाँ यह अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका था, वहाँ चुनावी प्रक्रिया चल रही थी।बीते समय 1927 से 1933 के बीच शाहाबाद जिले में परिषद के चुनाव में पिछडी जाति का मात्र एक उम्मीदवार ही चुनाव जीत सका था। त्रिवेणी संघ के गठन के बाद से ही 30/40 सदस्यों वाली परिषद में एक से ज्यादा सीटों पर पिछडी जातियों की जीत की शुरुआत हुई। त्रिवेणी संघ के खुले परिदृश्य में आने से मुकाबला पिछडी जातियों और  अगडी जातियों के संघर्ष में बदल गया था और  भभुआ परिषद के चुनाव में 2/5 (यानि 40 फीसदी) सीटें जीतीं। इसमें सारे मत जातीय संगठन के नाम पर हाँसिल कीये थे (अब आप तय कर लें कि जाति को राजनैतिक हथियार सर्वप्रथम किसने बनाया, यह जहर किसने फैलाया)। सांगठनिक और  आर्थिक संसाधनों की कमी के वजह से त्रिवेणी संघ 1933 का चुनाव तो हार गया, लेकिन रामराज सिंह के शब्दों में उनका मानना था, “वोट से भले हार गये, लाठी से नहीं हारे”, इसका अर्थ यह था कि हम वोट से जीत नहीं सके तो क्या हमारी लाठी में अभी भी दम है। शाहाबाद में त्रिवेणी आश्रम के निर्माण से इसके विस्तार में मदद मिली जिससे इसका फैलाव शाहाबाद से पटना, गया और  भागलपुर जिलों तक हो गया।

 
✧ 1939 में त्रिवेणी संघ और  अन्य पिछडी जातियों के संगठनों ने पिछडी और  दलितों के लिये रोजगार में आरक्षण की मांग उठा दी। 1952 में बिहार विधान सभा में पिछडी जातियों को आरक्षण दिलाने के लिये एक अध्यादेश प्रस्तावित किया गया। तब भारतीय संविधान ने दलितों का आरक्षण पहले से ही लागु कर रखा था। भले ही अध्यादेश पारित न हो सका, फिर भी इन जातियों ने अपने शक्ति प्रदर्शन के जरिये संघर्ष भूमि तयार कर ली थी। 40 साल बाद भी इन जातियों ने नारा बुलंद किया, “सौ में नब्बे पिछडे हैं तो नब्बे हिसा लेके रहेंगे”। जबकि सामाजिक खाई को गहराने से रोकने के लिये कुछ अगडे समूहों द्वारा यह भी नारा दिया गया, “फारवर्ड-हरिजन भाई भाई, पिछडी जाति कहाँ से आई”।यह विचार प्रवाह 1990 के मंडल कमीशन की रिपोर्ट और  अनुयोदन के प्रस्ताव के बाद तक जारी रहा और  इसने फिर एक बार अगडों और  पिछडों के ध्रवीकरण की भूमि तयार कर दी। 


✧ त्रिवेणी संघ ने पिछडी जातियों के सामाजिक रुप से चेतनशील बुद्धजीवियों जैसे यदुनंदन मेहता और  सरदार जगदेव सिंह के लिये मंच मुहैया किया ताकि पिछडी जातियाँ एक होकर लडें। बाद में इसे आगे बढाने में राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की भी भूमिका रही। त्रिवेणी संघ ने 1940 में एक पत्रिका छापनी शुरु की जिसका नाम था - THE TRUMPET OF TRIVENI (त्रिवेणी की तुरही)। इसके माध्यम से संघ अपनी बातों को और  मजबूती से उठाने के लिये अग्रसर हुआ।


✧ त्रिवेणी संघ ने अपनी कार्ययोजना में विभिन्न मसलों को शामिल किया। ये मुद्दे गाँवों की पुनर्संरचना, पंचायतों की सक्रियता, निरक्षरता के उन्मूलन, पुस्तकालय खोले जाने, अखाडों की स्थापना, स्वास्थ्य-सफाई को प्रमुखता देना,, उत्पादन बढाने के लिये खाद का प्रयोग, घरेलु उद्योग लगाने, सहकारी समितियाँ बनाने आदि से जुडी थीं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये ग्रामीण और  अन्य स्तरों पर स्वयंसेवी सेवाएँ बनायी गयीं जिन्हें त्रिवेणी सेना दल कहा गया। त्रिवेणी संघ ने शाहाबाद क्षेत्र में कुछ उद्देश्यों में सफलता हांसिल करने में सफल तो हुई पर 1945 में इसमें बिखराव आने लगा। इसके नेताओं के बहुत बडे हिस्से ने अपने आप को कांग्रेस से जोड लिया, जबकि अन्य सदस्य ‘Radical Democratic Party’ से जुड गये। इसके ठीक बाद इनमें से अधिकांश लोग राम मनोहर लोहिया की बनायी गयी ’Socialist Party’ के सदस्य बन गये। 


✧ त्रिवेणी संघ में एक शक्तिशाली सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन के रुप लेने की भरपुर क्षमता थी लेकिन अपने अतिवादी राजनैतिक मुद्दों के वजह से अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। उस दौर की लडाई के दौर में भाग ले चुके केसरी महतो की टिप्पणी थी, “हमारा एक संगठन था, हमारे अपने गीत थे, अपने नारे थे लेकिन हम हार गये। बहुत सारे नेताओं ने अपने आप को कांग्रेस पार्टी को बेच दिया।” 


❆ हालाँकि त्रिवेणी संघ कोई गहरी पैठ बनाने में असफल हो गयी लेकिन इसके प्रयास बेकार नहीं गये। शाहाबाद क्षेत्र जहाँ त्रिवेणी संघ ने विद्रोह की शुरुआत की, वही शाहाबाद बाद में नक्सल चरमपंथ का मुख्य केंद्र बनकर उभरा। इसी शाहाबाद ने जगदीश महतो और  रामेश्वर अहीर को पैदा कर दिया जिसने जातीय उन्माद को हिंसक रुप दे दिया।
 
✍️ संकलनकर्ता - साकेत बिहारी शर्मा

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