Tuesday, 23 September 2025

रामधारी सिंह दिनकर ओज और उर्जा के अद्वितीय कवि

 

रामधारी सिंह दिनकर ओज और उर्जा के अद्वितीय कवि
तबीयत चाहती है बात कुछ तुमको सुनाऊं
मगर, तुम कौन हो जो पंक्ति मेरी पढ़ रहे हो
‘स्वप्न और सत्य’-दिनकर
‘दिनकर’ का उदय 23 सितम्बर 1908 को तत्कालीन मुंगेर जिला (सम्प्रति बेगूसराय) के सिमरिया गांव में हुआ था. इनके पिता साधारण किसान थे. गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं था. किन्हीं के दरवाजे पर स्कूल खोला गया. बाद में, गांव में ही अपर प्राइमरी स्कूल खुल गया. जिसमें वह पढ़ने गये. बारह वर्षीय दिनकर ने 1920 में गांधी जी का दर्शन किया. राष्ट्रीय स्कूल बारो (सैयद जाफर सिद्दीकी ने गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रेरित होकर सरकारी मिड्ल स्कूल, बारो के समानान्तर यह स्कूल खोला था) ने ही दिनकर में राष्ट्रीयता का बीज बपन किया और कालान्तर में ‘रश्मिरथी’ पर आरूढ़ दिनकर के ‘हुंकार’ को लोगों ने ‘कुरूक्षेत्र’ में सुना.
‘दिनकर’ की कविताओं में राष्ट्रप्रेम कूट-कूट कर भरा हुआ है. इन्हें ओज और ऊर्जा का अद्वितीय कवि माना गया है. भारत की विशेषता को इन्होंने अपनी कविता ‘हिमालय का संदेश’ में इस तरह व्यक्त किया है- भारत एक विचार है, एक आदर्श है, एक मूल्य है. मनुष्य को जगाने की शक्ति भारत में है. दुनिया में जहां कहीं मानवता परेशान हुई है, भारत वहां जाकर खड़ा हो जाता है. पूरी दुनिया में सत्य, प्रेम, सहयोग, सद्भाव, सदाचार, सहिष्णुता के रूप में भारत सशरीर दिखायी पड़ता है. बड़ी अच्छी बात कही है एक विदेशी आलोचक ने कि गद्य चलना है जबकि कविता नृत्य करना. डाॉ नन्दकिशोर ‘नवल’ ने सच ही कहा है कि ‘दिनकर की कविताओं में राष्ट्रीयता और उद्बोधन भरा स्वर ही नहीं है इतिहास का मोहक संदर्भ भी है.’
अंग्रेजों का दमन अपनी सीमा लांघ रहा था, विदेशी साम्राज्यवाद के लाठी, बूट और गोली की दहशत में भारत जी रहा था. ऐसे माहौल में दिनकर के झंझावाती स्वरों ने राष्ट्र को जागृत, सचेत, गतिशील और ऊर्जावान बनाना शुरू किया. कवि अपने आगमन की सूचना किस प्रकार दे रहा है-
उदयाचल पर आलोक शरासन ताने
मैं आया जग में गीत विभा का गाने.
 
कवि कभी ठंडा नहीं पड़ा है. अनल-धर्मी गुण और प्रभंजन की प्रवृत्ति सर्वत्र, सदैव दिखायी पड़ती है. इनकी उक्ति में उष्मा है, उत्साह है और है उद्वेलन.
सबसे बड़ा धर्म है नर का, सदा प्रज्ज्वलित रहना
दाहक शक्ति समेट स्पर्श भी, नहीं किसी का सहना.
 
राष्ट्रीय कविता की ओर कवि के उन्मुख होने का तात्कालिक कारण था. उस समय के युवा वर्ग के सम्मुख स्वतंत्रता की प्राप्ति का एक लक्ष्य था. नेतृत्व देने वाले लोग युवाओं को क्रांति के लिए हर तरह से तैयार कर रहे थे. दिनकर की ओजस्वी वाणी में उत्साह जगाने की शक्ति थी. युधिष्ठिर स्वर्ग जा रहे हैं तो जाने दे, परन्तु हमें अर्जुन और भीम वापस कर दो, मुझे गांडीव और गदा दे दो.
रे रोक युधिष्ठिर को न यहां, जाने दे उनको स्वर्ग धीर.
पर फिरा हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर.
 
दिनकर की रचनाओं के शीर्षक ही इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि उनमें पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र करने की कितनी व्यग्रता थी.
कविता को अनगिनत लोगों तक पहुंचाने का महत्तर कार्य दिनकर की ओजस्वी वाणी ने किया. इनकी कविता को, इनके ही स्वर में सुनने का अवसर जिन्हें मिला, उनमें एक नयी स्फूर्ति का स्फुरण हुआ. कविता के प्रति सहज अनुराग को विकसित करने का श्रेय छायावाद के बाद के कवियों ने किया और मंच से काव्य के रसिक श्रोताओं का संबंध प्रगाढ़ होता गया. कविता और कवि दोनों के सम्मिलित दायित्व को समझने में जनसाधारण को भी सहूलियत होने लगी. जनता समझने लगी कि-
कविता जब किसी के पक्ष में या किसी के खिलाफ
अपनी पूरी अस्मिता के साथ खड़ी होती है
तब ईश्वर से भी बड़ी होती है.
-कवि छविनाथ मिश्र
 
दिनकर के पूर्ववर्ती कवियों में श्याम नारायण पांडेय, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिली शरण गुप्त थे. सुभद्रा कुमारी चैहान ने ‘झांसी की रानी’ लिखकर लोगों में जोश और उमंग बढ़ाया. राजस्थान में संत और सूरमा दोनों हुए हैं. श्याम नारायण पांडेय ने वन-वन फिरने वाले राणा प्रताप के बहाने भारतीय बलिदानी के लिए मुखरित स्वर में कहा-‘ तुम अजर बढ़े चलो.’ इन्होंने जनता की भाषा को काव्य भाषा बना दिया. यह एक अनोखी घटना थी. हिन्दी कविता को जनोन्मुख बनाने में ‘दिनकर’ और बच्चन का स्तुत्य योगदान रहा है. हिन्दी और राष्ट्रीयता साथ-साथ संचरित होने लगी. श्याम नारायण पांडेय तथा रामधारी सिंह दिनकर की वाणी में जैसी ओजमयी झंकृति थी, वह दुर्लभ है.
प्राची के प्रांगण बीच देख
जल रहा स्वर्ण-युग अग्नि ज्वाल,
तू सिंहनाद कर जाग यती
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
 
‘सामधेनी’ दिनकर का कविता-संग्रह है. इसे कलम के जादूगर बेनीपुरी को समर्पित किया है. बेनीपुरी को इन्होंने अपनी आत्मा का शिल्पी कहा है-
विधु पर आ जाऊं मिले अगर आधार एक
आत्मा के शिल्पी, बढ़ा किरण का तार एक
 
दिनकर कहते हैं-‘ राष्ट्रीयता का अंकुर मेरे भीतर ‘छात्र सहोदर’ पत्र ने उगाया था. वह अपने ढंग पर बढ़ता भी आ जा रहा था. किन्तु, जब मैं बेनीपुरी की संगति में आया, वह पौधा लहलहाकर वृक्ष बन गया.’ (संस्मरण और श्रद्धांजलियां)
दिनकर की राष्ट्रीयता को हम इस तरह सहेज सकते हैं- दिनकर ने क्रांतिकारियों का अभिनंदन किया, देश के अतीत और भूगोल की वंदना की, इसके साथ-साथ देश की आर्थिक विषमता के प्रति रोष व्यक्त किया. शोषित, पीड़ित और उत्पीड़ित जनता के लिए दिनकर ने खुलकर कहा-
श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र
भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर,
जाड़ों की रात बिताते हैं.
 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी विषमता और उत्पीड़न के खिलाफ इनकी लेखनी आग उगलती रही. ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ में इन्होंने लोकशक्ति के विद्रोह को स्वर दिया है.
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने राष्ट्रकवि दिनकर के संदर्भ में कहा है-‘इस युग के साहित्य की धड़कनें राष्ट्रीय स्वर पर हां से सुनी गयी और जिसके खटके सर्वत्र सराहे गये और जिसका जीवंत सृजन बेयाद किये हुए याद हो जाने लगा, वह साहित्य था रामवृक्ष बेनीपुरी और रामधारी सिंह दिनकर का.’ दिनकर अपनी रचनाओं की पंक्ति-पंक्ति में रचे-बसे हैं.
----- कृष्णमोहन सिंह

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