Thursday, 28 November 2019

जाति की रट जहाँ हमें सामाजिक रूप से एकजुट करती है वहीं राजनैतिक रूप से कमजोर - साकेत बिहारी शर्मा




हमारे हर action का चित और पट्ट (heads and tails) दोनों होता है जिसकी विवेचना को सहजता से लेने की जरूरत है। जातीय हूँकार में हमारा स्वाभिमान, अभिमान का प्रदर्शन होता है जो सामाजिक रूप में हमारे मनोबल को बढ़ाता है लेकिन अन्य वर्गों से हमें दूर भी करता है| भूमिहार समाज अपने शक्ति से कितने ऐसे विधान सभा क्षेत्र हैं जहां पर अपने दम पर विधायक और सांसद चुन सकते हैं ! हाँ, यह बात है कि हमारे पास कुछ बहुसंख्यक सीटें हैं लेकिन वहाँ भूमिहार बनाम all की स्थिति बन जाती है और यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती है| राजनैतिक रूप से भाजपा जैसी पार्टियों से जुड़े रहना भूमिहार समाज की विवशता इसलिये भी है क्योंकि इस प्लेटफार्म के माध्यम से अन्य वर्गों का समर्थन राजनेताओं को आसानी से हाँसिल हो जाता है जबकि भूमिहारों के लिये स्वतंत्र राजनैतिक पहचान स्थापित करने की दिशा में यह सबसे बड़ी चुनौती है।



समावेशी सिद्धांत ही राजनैतिक सफलता के तरफ वापिस ले जा सकता है। सबसे बड़ी बात है कि इन सालों में श्री बाबु का व्यक्तित्व कांग्रेस के दायरे से बाहर निकलकर भाजपा तक पहुँच चुका है जो उनके समावेशी होने का पुख्ता प्रमाण है। परम्परागत तौर पर श्री कृष्ण बाबु के समय दलित एवं मुसलमान भी हमारे साथ रहा करते थे लेकिन समय के साथ यह सामंजस्य बिखर गया।

कन्हैया की राजनैतिक विचारधारा वामपंथ की ओर प्रेरित है, विघटनकारी शक्तियों के सहारे राजनीति में चमका पर भूमिहार होकर भी वह दलितों और मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहा है। अपने समाज के अंदर कन्हैया के स्वीकार्यता के बढ़ने के पीछे भी यह सोंच है, हम सब मानें या न मानें, और वह विशुद्ध राजनीति कर रहा है।



हमारे जनसंख्या के हिसाब से, पोलिंग पावर के हिसाब से, बिना सामंजस्य के बहुत कुछ हाँसिल नहीं कर सकते, राजनीति में व्यापक सफलता हमें तब तक नहीं मिल सकती है जब तक किसी अन्य वर्ग को स्वयं से जोड़ने में सफल नहीं होते| जहानाबाद लोक सभा चुनाव के समय जब हमलोग घूम रहे थे तब कई जगह अभिभावकों ने यह सवाल पूछा था कि आपलोगों के पास चुनाव जीतने का क्या combination है, जिसका संतोषजनक उत्तर हम नहीं दे पा रहे थे। जबकि किसी भी राजनैतिक विकल्प को जन्म देने के लिये इस सवाल का जवाब तो समाज को हमें देना ही होगा।



अमर शहीद ब्रह्मेश्वर मुखिया जी सामाजिक लड़ाई में किसानों के अगुआ बने थे लेकिन अपने जेल से छूटने के बाद राजनैतिक चुनौती पेश करने के लिये जिस व्यूह की रचना वह करना चाहते थे, उसमें किसान और मजदूर, दोनों वर्ग शामिल होते जैसा कि उनके द्वारा एक साक्षातकार में भी कही गई थी| अंग्रेजी में एक कहावत है, "New routes are usually found only from places where the caravans lose their way", इसलिये हम समन्वय के तरफ बढ़कर ही अपनी राजनैतिक बुनियाद में प्राण फूँक सकते हैं|