“अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रतिबन्ध मुक्त हुआ तो फिर रणवीर संग्राम समिति प्रतिबंधित क्यों ?”
आज़ाद हिन्दुस्तान में कई ऐसे संघर्ष हुये जिसे हम कहीं न कहीं व्यवस्था के कमियों के पूरक के रूप में देख सकते हैं और सांस्कृतिक संरक्षण व बहुआयामी जनमानस के भावनाओं के मान, सम्मान के रक्षा की लडाई भी मानते हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन्हीं में से एक संगठन रहा है जिसका बीजारोपण आज़ादी पूर्व पर व्यापक उभराव 90 के दशक में सामने आया जब वह भारत के राजनैतिक मानचित्र के शीर्ष पर जा पहुंचा |
उसी समानान्तर समयकाल में, किसानों के जमीन व मान सम्मान की रक्षा के लिए व वामपंथ के उग्रवादी स्वरुप से त्रस्त होकर बिहार में लोगों ने रणवीर संग्राम समिति का गठन किया जिसने कालांतर में पुरे शाहाबाद व मगध के इलाकों में चिर शांति के स्थापना में मजबूत भूमिका निभाई | यह संगठन रक्तरंजित नरसंहारों के प्रतिकार स्वरुप सामने आया जब 90 के दशक में क्रमवार किसानों का तीव्र सामूहिक हत्यायों को अंजाम दिया जाने लगा | दलेलचक बघेरा (52 ,1987), बारा (34,1992), जलपुरा (11,1997), चौरम (9,1997), रामपुर आईयारा (7,1998), उसरी बजार (7,1999), भीमपुरा (4,1999), सेनारी (34,1999), अपसढ़ (12,2000), आदि में अधिकांश शिकार लोग एक विशेष जाति से आते थे, खासकर भूमिहार ब्राह्मण |
ठीक इसी सामानांतर काल में यानी 90 के दौर में इस्लामिक चरमपंथियों द्वारा कश्मीरी पंडितों का भी सामूहिक नरसंहार किया जा रहा था पर किसी प्रकार के प्रतिकार के आभाव में व व्यवस्था के संवेदनहीनता के कारण भारी संख्या में कश्मीर घाटी से वो पलायन को मजबूर हो गये | 1989 के अंत से लेकर 1990 तक में करीब 3 से 6 लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनने को विवश हो गये, आज उसी घाटी में 2016 के आंकड़ों के अनुसार उनकी संख्या 2000-3000 मात्र बच गयी है |
बिहार में रणवीर आन्दोलन के उद्भव होते होते किसान समुदाय के अधीन करीब एक लाख एकड़ जमीन लाल आतंक की भेंट चढ़ चुका था, भारी संख्या में लोगों का गाँवों से शहरों की ओर पलायन हुआ, शाहाबाद और मगध के प्रमुख शहरों, गया, पटना, आरा, जहानाबाद की आबादी में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गयी, कई नये मोहल्ले अस्तित्व में आये जो समुदाय विशेष बाहुल्य थे |
पर सरकारों ने इस संगठित प्रतिकार को कुचलने के लिये और अपने नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए इसके
साथ आतंकी संगठनों की भाँति व्यवहार करते हुये 1995 में प्रतिबंधित कर दिया | आखिर ऐसा व्यवहार क्यों ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को पलटेंगे तो आजाद भारत में तीन दफा इसे प्रतिबंधित किया गया, पहली बार 1948 में जब महात्मा गाँधी के हत्या के बाद कथित संलिप्तता के कारण, दूसरी बार 1975-1977 के आपातकाल के दौरान और तीसरी बार 1992 के बाबरी विध्वंश के बाद
| आरएसएस पर पहली बार प्रतिबन्ध इस शर्त पर उठाया गया कि वह भारतीय संविधान के
प्रति निष्ठा प्रकट करे, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को स्वीकार करे व लोकतान्त्रिक
मूल्यों को संगठन के संचालन में अंगीकार करे | संघ ने अपने गतिविधियों को कायम
रखने के लिए व संगठन को व्यवस्थागत दमन से बचाने के लिए ही राजनैतिक ढाल के रूप
में जनसंघ का गठन किया व आपातकाल के तुरंत बाद भाजपा अस्तित्व में आया, राजनैतिक
फ्रंट एक प्रकार से संघ के प्रतिरक्षा का मुख्या हथियार बना लेकिन रणवीर संग्राम
समिति के पास ऐसी किसी आवरण का अभाव रहा | रणवीर आन्दोलन को राजनैतिक संरक्षण देने
के आरोप की जांच के लिए “अमीर दास कमीशन” का गठन किया गया पर वह भी तय समयसीमा के
भीतर किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सका जिसके कारण 2006 में उसे भंग कर दिया गया | वहीं
वामपंथी संगठन अपने नापाक हरकतों को विभिन्न तरीकों से छुपाने में सफल रहे, उन्हीं
में एक कुख्यात संगठन सी पी आई (माले) है जिसके पास में बिहार में 1970 में ही
कथित रूप से 100 गुरिला स्क्वाड था और करीब 300 गाँवों को इसने लाल गतिविधियों का
केंद्र बना दिया था, तब से आज तक प्रतिबन्ध मुक्त रहते हुये अपनी राजनैतिक हनक भी
विकसित करने में कामयाब रहा |
समय
है व्यवस्था इसपर लगे प्रतिबन्ध को तुरंत उठा ले व सैकड़ों की संख्या में दशकों से
बंद किसानों को अविलम्ब कारागारों से मुक्त करे व उनपर दर्ज मामलों को सार्वजानिक
रूप से माफ़ करते हुये समाप्त कर दे, यह राज्य और देश के स्थायी शांति के लिये
नितांत आवश्यक है |
लेखक – विष्णुकान्त शर्मा


