Tuesday, 26 August 2025

बिहटा पंजाब नैशनल बैंक के बैंक प्रबंधक की हत्या मामले का उद्भेदन: आईपीएस अभयानंद

 


आधुनिक समय में आधुनिक तकनीकें

#बिहटा स्थित पंजाब नेशनल बैंक के शाखा प्रबंधक
दिन का काम खत्म करने के बाद अपनी मोटरसाइकिल से पटना स्थित अपने घर के लिए निकले। वर्ष 2013 के उस दिन, हमें खबर मिली कि बिहटा और पटना के बीच राजमार्ग पर किसी सुनसान जगह पर, एक अन्य मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने उन्हें ओवरटेक किया और गोली मारकर उनकी #हत्या कर दी।
पटना के एसएसपी सहित स्थानीय पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और सामान्य आवश्यक कार्रवाई की।
पंजाब नेशनल बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल मेरे कार्यालय में मुझसे मिला और स्पष्ट रूप से मामले का पता लगाने और हत्यारों की गिरफ्तारी की माँग की।

स्थानीय मीडिया इस घटना से काफी प्रभावित था। मैंने
पटना के #एसएसपी को फोन किया और मामले की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की।
मुझे पता चला कि सिर्फ़ नियमित काम हुआ था, और अगर
मामले को यहीं छोड़ दिया जाता, तो यह बिना किसी सुराग के ख़त्म हो जाता।
ज़्यादा से ज़्यादा, पुलिस किसी सूत्र द्वारा कुछ और जानकारी मिलने का इंतज़ार कर सकती थी।

मैंने अकेले ही जांच अधिकारी के साथ बैठकर मामले का विश्लेषण करने का फ़ैसला किया। मेरे दिमाग़ में एक चलचित्र की तरह, मैंने कल्पना की कि शाखा प्रबंधक को दो मोटरसाइकिल सवार उसकी शाखा से लेकर सुनसान जगह तक पीछा कर रहे हैं, जहाँ उन्होंने उसे ओवरटेक किया और उस पर गोली चला दी। मुझे यकीन था कि अगर मैं शुरुआती चरण में ही मकसद जानने के इरादे से मामले की जाँच शुरू करूँ, तो मैं भटक जाऊँगा, क्योंकि मकसद बहुत ज़्यादा हो सकते हैं। किसी भी घटना का सबसे मज़बूत सुराग हमेशा #घटनास्थल और उसके सबूतों से ही मिलता है। किसी भी जाँच में ये दोनों कभी नहीं छूटने चाहिए।

इसे ध्यान में रखते हुए, मैंने मृतक की बैंक से घटनास्थल तक
आवागमन पर नज़र रखने के लिए अपना मानसिक मॉडल तैयार किया। इस रास्ते पर मोबाइल नेटवर्क
को सेवा प्रदान करने वाले तीन मोबाइल टावर थे। हमने तीनों टावरों की गतिविधि का डंप प्राप्त किया और इस उद्देश्य के लिए बनाए गए एक सॉफ्टवेयर
के माध्यम से उसका विश्लेषण किया।

इसके बाद, हमने उसके शाखा छोड़ने और घटनास्थल पर पहुँचने के बीच के समय को नोट किया। इन दोनों घटनाओं को गूगल मैप्स पर मैप किया गया और औसत गति की गणना की गई। हमने यह जानकारी सॉफ्टवेयर में डाली, जिससे सभी मोबाइल नंबर निकले जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा करते थे: (1) नंबर शाखा से घटनास्थल तक पूरे रास्ते में चलता हुआ होना चाहिए, (2) औसत गति पीड़ित की गति से मेल खानी चाहिए, और (3) इस दौरान उस मोबाइल नंबर के लिए टावर में दो बार बदलाव होने चाहिए। यह एक बहुत ही प्रभावी मॉडल साबित हुआ। मुझे आज भी याद है, मैंने रात में एकांत जगह पर जाँच अधिकारी के साथ एक मीटिंग तय की थी और एक कंप्यूटर कोचिंग संस्थान से एक सॉफ्टवेयर शिक्षक की सेवाएँ ली थीं। शिक्षक ने सॉफ्टवेयर में मेरे तर्क को कोड करने में हमारी मदद की। वह हर कोशिश के साथ उस तर्क को और भी परिष्कृत करता गया, और कुछ घंटों की मेहनत के बाद, हम 17 प्रासंगिक मोबाइल नंबरों को छाँटने में कामयाब रहे।

हम इस प्रगति से काफी संतुष्ट थे। अगले दिन, हमने उन सभी 17 मोबाइल नंबरों को निगरानी में डाल दिया।
24 घंटों के भीतर, हम उनकी बातचीत के आधार पर सूची को दो नंबरों तक सीमित कर पाए। इन दोनों नंबरों पर अक्सर बातचीत होती थी, ज़्यादातर इस घटना के बारे में और पुलिस उनके कितने करीब पहुँच रही है, इस बारे में। वे इस बात से खुश लग रहे थे कि पुलिस अब तक कोई सुराग नहीं ढूंढ पाई है, जबकि हम बेहद खुश थे कि अब मामला सुलझ जाएगा।

ये दोनों व्यक्ति बिहटा के ही रहने वाले थे। पुलिस ने उनके घरों पर छापा मारा। मैंने #FSL टीम को इस छापेमारी के दौरान मौजूद रहने का निर्देश दिया था क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि वैज्ञानिकों ने घटनास्थल की जाँच पुलिस से बेहतर की है। उस दिन मेरी इस राय की पुष्टि हुई।
संदिग्ध के घर की जाँच करते समय, उन्हें एक गैरेज में खड़ी एक मोटरसाइकिल मिली। मोटरसाइकिल की सावधानीपूर्वक जाँच करने पर उसके मडगार्ड पर खून का निशान दिखाई दिया। यह संदेह करते हुए कि यह खून का निशान मृतक का हो सकता है, उन्होंने मोटरसाइकिल को उठाया और फोरेंसिक जाँच के लिए उसे ज़ब्त कर लिया। खून की पूरी सीरोलॉजिकल और जेनेटिक जाँच के बाद मुझे बताया गया कि यह #मृतक के खून से बिल्कुल मेल खाता है।

अपराधियों की सफलतापूर्वक पहचान करने के बाद, हम मामले के मकसद की जाँच में लग गए। हमने शाखा के सदस्यों के साथ बैठकर पता लगाया कि ये दोनों व्यक्ति दोस्त थे और उन्होंने शाखा से ऋण लिया था। ऋण चुकाने को लेकर शाखा प्रबंधक के साथ कुछ मतभेद थे, जिसके कारण यह घटना घटी।

अगर हमने पहले मकसद जानने की कोशिश की होती और फिर हत्यारों को ढूँढने की कोशिश की होती, तो यह एक बेतुका काम होता। मामले का खुलासा बहुत ही शानदार तरीके से हुआ। हम हत्यारों को गिरफ्तार कर सके और उन पर मुकदमा चला सके।

- सेवानिवृत्त आईपीएस अभयानंद की पुस्तक "अनबाउंडेड" के अंश
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Modern techniques in modern times 

The branch manager of the Punjab National Bank in Bihta 
left for his home in Patna on his motorbike after finishing 
his job for the day. In the twilight of that day in the year 
2013, we got the news that he was overtaken by two men 
on another motorbike, somewhere in an isolated place on 
the highway between Bihta and Patna, and was shot dead. 
The local police, including the SSP of Patna, went to the 
place of occurrence and carried out the usual necessary 
actions. A delegation of very senior officers from the 
Punjab National Bank met me in my office and obviousiy 
demanded detection of the case and the arrest of the 
murderers.

The local media was ablaze with this incident. I called 
the SSP Patna and enquired about the process of the case. 
I got to know that only routine work had been done, and if 
the case was left at this, it would just end in no-clue case. 
At best, the police could wait for some source to come up 
with some more information.

I decided to sit down with the IO, all by myself, to analyse 
the case. Like a movie in my head, I visualized the branch 
manager being tracked by the two motorcyclists right from his 
branch to the deserted place, where they overtook him and 
fired a shot at him. I was sure that if I started investigating 
the case with an approach to find motives in the initial stage 
itself, I would get lost, as motives could be too many. The 
strongest clue of any incident, is always found at the place of 
occurrence and the exhibits thereof. These two should never 
be lost in any investigation.

Keep this in mind, I drew up my mental model to track
the movement of the deceased from the bank to the place of 
occurrence. There were three mobile towers catering to the 
mobile network along this route. We got the activity dump 
of all the three towers and analysed it through a software 
that was created for this purpose.

Next, we noted the time between the event of him leaving 
the branch and the next event of him reaching the place of 
occurrence. These two events were mapped on Google Maps, 
and an average speed was calculated. We fed this information 
to the software, which churned out all the mobile numbers 
that met the followingconditions: (1) the number should be 
in motion for the entire route from the branch til the place 
of occurrence, (2) average speed should match that of the 
victim, and (3) there should be two changes in the tower 
for that mobile number during this duration.

This turned out to be a very effective model. I still 
remember, I had fixed up a meeting with the Investigating Officer in a secluded 
place in the night and had called in for the services of a 
Software teacher from a computer coaching institute. The 
teacher helped us code my logic into the software. He went 
on to refine that logic more and more with each attempt, 
and after putting in an effort for a few hours, we were able 
to shortlist 17 relevant mobile numbers. 

We were quite satisfied with this progress. The next 
day, we placed all those 17 mobile numbers on surveillance. 
Within 24 hours, we could refine the list to two numbers 
based on their conversations. These two numbers had 
frequent discussions, mostly about this incident and how 
far the police was getting near them. They sounded happy 
that the police had not been able to find any clue thus far,
while we were extremely happy that now the case would 
be cracked. 

These two men were residents of Bihta itself. The police 
raided their houses. I had instructed the FSL team to be 
present during this raid since l always felt that scientists 
did a better job at examining the place of occurrence than 
policemnen. This opinion of mine was reaffirmned that day. 
While examining the house of the suspect, they found a 
motorcycle parked inside a garage. A careful examination of 
the motorcycle brought out a blood mark on its mudguard. 
Suspecting that the blood mark could be of the deceased, they 
lifted the motorcycle and seized it for forensic examination. It 
was reported to me after a complete serological and genetic 
examination of the blood that it was a perfect match with 
that of the deceased.

After successfully identifying the criminals, we went into 
the motive of the case. We sat down with the members of 
the branch to locate that these two persons were friends 
and had taken a loan from the branch. There were some 
issues with the branch manager on the repayment of the 
loan which culminated in this incident.

Had we started by first trying to figure out the motive 
and then trying to find the killers, it would have been a wild 
goose chase. The case was wonderfully detected. We could 
arrest the killers and put them on trial. 


- Extracts from the Book "Unbounded" by Retd IPS Abhayanand

Friday, 22 August 2025

वल्लभ के प्रति श्रद्धा निवेदित कीजिए, आपकी राष्ट्रभक्ति 24 कैरेट सोना की तरह शुद्ध मानी जाएगी

इन दिनों देश में गुजरात से दिल्ली तक, अयोध्या से मथुरा तक, जानकी #वल्लभ, सरदार #वल्लभभाई पटेल और राधे #वल्लभ जैसे नाम श्रद्धा के केन्द्र बन गए हैं। आप किसी #वल्लभ के प्रति श्रद्धा निवेदित कीजिए, आपकी राष्ट्रभक्ति 24 कैरेट सोना की तरह शुद्ध मानी जाएगी। अब भय, भूख और भ्रष्टाचार से लड़ाई का आह्वान करने वाली पार्टी के रत्नों में एक नया रत्न शामिल हो गया है। आप इसके लिए पार्टी के देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं को नहीं, शीर्ष नेतृत्व को बधाई दीजिए। अब पोस्टर में, पंडालों में, मंचों पर मोकामा वाले नीलम #वल्लभ से लेकर सहरसा वाले 'लवली #वल्लभ' तक #वल्लभ ही #वल्लभ नजर आएंगे। #वल्लभ का चेहरा अब आत्म गौरव, बढ़ते बिहार और चारित्रिक मूल्यों का चेहरा बन गया है।

मंच पर दिव्य विभा कुछ ऐसे फैलीं कि उनके #वल्लभ के दामन का दाग धुल गया जी! यह सब सिर्फ 'गया जी' का प्रताप नहीं है। लोकतंत्र में और भी गया-गुजरा धाम है। आजकल उकी की महिमा है। अब करोड़ों देशवासियों की लोकतंत्र में आस्था और मजबूत होगी! मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर कल गया जी में चारा चबाने-पचाने वाले राजा भी पधारे होते तो जंगल राज के सारे दाग धुल जाते। गया जी सचमुच मोक्षदायिनी हैं। मैं तो तेजस्वी - प्रतापी पुत्रों को नसीहत ही दे सकता हूं कि अपने पिता के दागों को धुलवाने के अवसर तलाशें। अगर इस धरा से प्रस्थान करने से पहले मोक्ष की गारंटी मिल जाए तो श्रवण कुमारों को भगीरथ प्रयास करने ही चाहिए। मेरा मानना है कि गया जी में समय-स्थान और ग्रह-नक्षत्रों का अद्भुत संयोग रहा होगा। गुजराती और बिहारी पंडों की जुगलबंदी जारी रहे तो अगले तीन-चार महीनों में दाग धुलवाने और मोक्ष प्राप्ति के पुण्य प्रयोग बार-बार दुहराए जाएंगे। राजनीतिक पंडित बताते हैं कि चुनावों के समय यह सुयोग घनीभूत होता है। लोकसभा चुनाव से पहले 'लवली #वल्लभ' बेदाग हो गए। जब वे सभाओं में और संगठन में बगुला भगत की तरह बैठते हैं तो उनका लिबास दमकता है। अगर किसी माई के लाल ने उन पर उंगली उठाई तो जीभ काटकर हाथ में थमा दी जाएगी। हर नदी मोक्षदायिनी नहीं होती। हर घाट पर दाग नहीं धुलते। अलग-अलग कालखंड में नदियों का महात्म्य घटता -बढ़ता रहा है। कभी सामाजिक न्याय वाली नदी भी पवित्र मानी जाती थी। साधु यादव और हेमलता यादव के पुत्र मृत्युंजय यादव जब उस पवित्र नदी में डुबकी लगाकर बेदाग घूमने लगते थे, तब जाकर शिल्पी- गौतम और चंपा विश्वास की आत्मा को शांति मिलती थी। संतप्त आत्माओं को मोक्ष दिलाने में सियासी धाराओं का गौरवशाली इतिहास लिखा जाना चाहिए। 'अन्नू #वल्लभ' मुगालते में थे। लालटेन लेकर सामाजिक न्याय की उस नदी में डुबकी लगा बैठे, जिसका घाट आजकल अपशगुनी हो गया है। लेने के देने पड़ गए। कभी 'रमा #वल्लभ' भी गलत घाट पर बैठे थे। अंजाम सबको पता है। रमा जब कमल सरोवर में डुबकी लगा दीं, उनके दिन फिर गए। यश, पद, प्रतिष्ठा के साथ माला और जयकारे! जो खुद दागदार हैं, वे दूसरे को मोक्ष कैसे प्रदान करेंगे? सोचना चाहिए था कि हर कीचड़ में कमल नहीं खिलता है। 'रावड़ी #वल्लभ' और 'अन्नू #वल्लभ' को पता होना चाहिए कि अच्छे दिन कहां और कैसे आते हैं। उन्हें 'लवली #वल्लभ' और 'राज #वल्लभ' से सीख लेनी पड़ेगी। चारा का दाग धुलवाने के लिए 'राबड़ी #वल्लभ' को कमल के फूल वाले सरोवर में डुबकी लगानी पड़ेगी। कीचड़ से लथपथ न होंगे तो कैसे निष्पाप कहलाएंगे। अगर भरोसा नहीं है तो अजीत पवार से सीखें। अल्प अवधि के लिए कीचड़ में डुबकी लगाएं। एक बार दाग धुल जाए तो फिर निकल भागें। पापों का प्रायश्चित सिर्फ फल्गु किनारे नहीं होता है। कमल- सरोवर में भी होता है। मेरा मन हलका हो गया है। मेरे मन में वर्षों से एक सवाल उठता आ रहा था। जब भारतीय जन मानस में सभी #वल्लभ श्रद्धा और प्रेम के प्रतीक हैं तो 'राज #वल्लभ' नाम में क्या बुराई है? इस नाम पर राजनीतिक दल झेंपते क्यों हैं? व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उसके नाम का असर होता है। राज #वल्लभ आखिर अधम, नीच, पतित या पापी कैसे? आज से मैं चैन की नींद सो पाऊंगा। राज #वल्लभ भी आज से पवित्र और पूजनीय हो गया। जब पारस पत्थर के स्पर्श से निर्जीव लोहा भी सोना बन जाता है तो राज #वल्लभ भी किसी विचारधारा के स्पर्श से पवित्र क्यों नहीं हो सकता है? मुझे इसी दिन का इंतजार था। अच्छी संगति में आकर सबरी की तरह राज #वल्लभ का भी उद्धार होगा ! मेरा विश्वास सच निकला है। यह सब #वल्लभ शब्द का प्रभाव है। न्यायालय ने राज #वल्लभ को पाक-साफ घोषित किया।इतने से काम नहीं चलना था। डबल इंजन ने राज #वल्लभ की पाकीजगी पर मुहर लगा दी है। अगर बिहार को तरक्की के रास्ते पर ले जाना है। अगर भारत को विश्वगुरु बनाना है तो हमें राज #वल्लभ को भी वही मान-सम्मान देना होगा, जो हम अयोध्या वाले जानकी #वल्लभ को देते आए हैं। आने वाले दिनों में जानकी #वल्लभ और राज #वल्लभ के पुण्य प्रताप से बिहार अपने गौरवशाली अतीत को हासिल करेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि आज की रात नवादा जिला के रहुई प्रखंड की नाबालिग रेप पीड़िता भी चैन की नींद सोएगी। अगर राज #वल्लभ ने उस नाबालिग को छुआ भी होगा तो आज से वह 'अनचाहे परन्तु पवित्र' स्पर्श से बिल्कुल पवित्र मानी जाएगी। ऐतिहासिक स्पर्श से वह अहिल्या हो गई। कल तक मारे शर्म के घर से बाहर नहीं निकल रही थी। अब सीना तानकर चलेगी। एक सप्ताह पहले उसने रुआंसा होकर मीडिया को बताया, न न्याय मिला और न नौकरी। भले ही नौकरी नहीं मिली, उसे न्याय मिल गया है। अब उसकी शिकायत दूर हो गई होगी। राज #वल्लभ अब डबल इंजन की गारंटी बन गया है। राज #वल्लभ का चेहरा बिहार के विकास का चेहरा बनेगा। राज #वल्लभ का चेहरा बिहार के मतदाताओं में भरोसा पैदा करेगा। यह चेहरा महिलाओं और खासकर नाबालिग लड़कियों को हौसला, हिम्मत, इज्जत की गारंटी देगा। एक मामले में उस राजनीतिक दल के शेयर होल्डर से सीख लेनी पड़ेगी, जिसने आपरेशन ब्लूस्टार के लिए माफी मांगी। क्या अब उन दलों को राज #वल्लभ के पैर छूकर माफी नहीं मांगनी चाहिए, जो कल तक विधायक विभा देवी के #वल्लभ - 'राज #वल्लभ' को अधम, नीच और पापी कहते नहीं थकते थे। विभा देवी को पवित्र गया जी के मंच पर बैठाने या डबल इंजन मार्का टिकट देने के बावजूद प्रायश्चित अधूरा रह जाएगा। हमे हर चुनावी मंच पर उपाध्याय जी, मुखर्जी जी, लोहिया- जयप्रकाश की तस्वीरों के बगल में विभा के #वल्लभ की तस्वीर रखकर फूल माला चढ़ाना चाहिए। इससे सामाजिक समरसता बढ़ेगी। अब तो न्यायालय ने उन्हें बेकसूर बताया है। आने वाले दिनों में हमें जिला मुख्यालयों में राज #वल्लभ जी के मंदिर बनवाने चाहिए। नई पीढ़ी प्रेरणा ग्रहण करेगी। राज #वल्लभ जी की कहानी सुनाई जाएगी। उन पर कैसे-कैसे आरोप मढ़े गए। उन पर क्या गुजरी होगी। नादानी में कुछ राजनीतिक दलों ने भी चरित्र हनन किया। जेल में बंद किए गए, परन्तु बेचारे ने हिम्मत नहीं हारी। जेल से संघर्ष किया। पत्नी को आगे किया। विभा देवी ने उत्तराधिकारी बनकर पति की ओर से लड़ाई लड़ी। बिरादरी वालों को बाबा केवल साह के मंदिरों से प्रेरणा लेकर बाबा राज #वल्लभ के मंदिर का निर्माण कराना चाहिए। राज #वल्लभ के बगल में विभा देवी एक हाथ में तीर और दूसरे में कमल लेकर विराजेंगी। यह सब राज #वल्लभ के जीते जी हो जाए तो अच्छा। गुजराती- बिहारी पंडों से मंदिर का अनावरण कराना चाहिए। आने वाली पीढ़ियां राज #वल्लभ महाराज के मंदिर में शीश नवाकर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से प्रेरणा ग्रहण करेंगी। अगर जेएनयू या बीएचयू के विद्वान शिक्षक चाहें तो संत राज #वल्लभ महाराज के जीवन वृत्त पर शोध करा सकते हैं। शोध के दौरान तलहटी से जो खाद निकलेगा, उससे लोकतंत्र की जड़ मजबूत होगी। लोगों की आस्था बढ़ेगी। हमारे धर्मग्रंथों और इतिहास के पुस्तकों में ऊंगली माल डांकू, वाल्मीकि उर्फ रत्नाकर की कथाएं प्रचलित हैं। आज से इस शृंखला में राज #वल्लभ नाम जुड़ गया है। 

Sri Bibhesh Trivedi जी के कलम से.. 

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Thursday, 21 August 2025

ECONOMICS OF CRIME: Retd IPS Abhayanand

मेरा मानना ​​है कि अपराधियों की ताकत और अपराध करने की क्षमता उनके 'व्यक्तित्व' में नहीं, बल्कि उनकी संपत्ति और उनकी संपदा में निहित होती है। पुलिसिंग का ध्यान व्यक्ति से संपत्ति की ओर मोड़ने की यह इच्छा मेरे अंदर लंबे समय से चल रही थी। पुलिस प्रमुख बनने के बाद मुझे अपने विचारों को अमल में लाने के लिए सिर्फ़ तीन साल मिले। मेरे लिए एकमात्र सकारात्मक पहलू Prevention of money laundering act 2002 था, दुर्भाग्य से यह अधिनियम पुलिस को कोई भी शक्ति प्रदान नहीं करता। मैं केवल प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभा सका, जो इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए पीएमएलए के तहत बनाई गई एजेंसी है। बिहार पहला राज्य था जिसने इस विचार के साथ प्रयोग किया और गैंगस्टरों की अवैध संपत्ति और सफेदपोश संपत्तियों की ज़ब्ती के आदेश पारित किए गए। यह विचार कि प्रत्येक अपराध अनिवार्य रूप से एक आर्थिक गतिविधि है, मेरे करियर के शुरुआती दिनों से ही मेरे मन में बैठा हुआ था। अपने 37 साल के लंबे सफ़र में, मैंने पुलिसिंग के नए क्षितिज को उजागर करने की कोशिश में अनछुए रास्ते अपनाने में कभी संकोच नहीं किया।
उदाहरणों में शामिल हैं: - #फर्जी ज़मानत [मधेपुरा 1981 से 1982]: जब मैंने फर्जी ज़मानतों पर आधारित ज़मानत बांड रद्द करवाने शुरू किए, तो मधेपुरा में डकैतियों की संख्या शून्य हो गई। - #नक्सली अभियान [औरंगाबाद 1982 से 1983]: नक्सली अभियानों के पीछे की आर्थिक ताकत अवैध गतिविधियों से आती थी, जिनमें केंदू पत्तों की तस्करी से लेकर बेनामी ज़मीन पर खेती तक शामिल थी। इन अवैध गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाने से इलाके में उनके आतंक को कमज़ोर करने के लिए काफ़ी था। - #आय से अधिक संपत्ति [सीबीआई 1984 से 1988] - #अपहरण [बेतिया 1992 से 1993]: गैंगस्टरों को मिलने वाली फिरौती की रकम बहुत कम थी, जो गिरोह को चलाने के खर्च को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं थी। अपहरण आतंक पैदा करने के लिए किए जाते थे ताकि उनकी अवैध गतिविधियों से पैसा कमाया जा सके। मैंने इन गैर कानूनी गतिविधियों पर सीधे प्रहार करना शुरू कर दिया, जिससे गैंगस्टरों की योजनाएँ धराशायी हो गईं। - #खनन माफिया [एडीजी मुख्यालय 2006 से 2008] - आर्थिक अपराध इकाई [डीजीपी 2011 से 2014]: यह इकाई अपराध कम करने और काले धन पर लगाम लगाने के लिए सीधे डीजीपी को रिपोर्ट करती हुई बनाई गई थी। यह प्रवर्तन निदेशालय के लिए PMLA लागू करने हेतु प्रेरक एजेंसी बन गई। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसने अपने गठन के उद्देश्य को पूरी तरह से सही ठहराया। - #अवैध शराब त्रासदी [डीजीपी 2011 से 2014]: इस अवधि के दौरान, राज्य में लगातार तीन अवैध शराब त्रासदी की घटनाएँ हुईं। चूँकि उस समय शराबबंदी नहीं थी, इसलिए शराब की मौजूदगी के ख़िलाफ़ कोई सीधी आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती थी। मैंने इन घटनाओं को आर्थिक अपराधों में बदल दिया और इन्हें राज्य के राजस्व की हानि के रूप में पेश किया। PMLA के तहत उनकी संपत्तियाँ ज़ब्त कर ली गईं, जिससे उनके धन का स्रोत छिन गया। - #ज़मानत रद्द करना [डीजीपी 2011 से 2014]: ज़मानत रद्द करने के पीछे मुख्य उद्देश्य अपराधी को फिर से सलाखों के पीछे न डालना था बल्कि इन कार्रवाइयों ने इन अपराधियों को उनकी नौकरियाँ और उनकी आजीविका के स्रोत छीन लिए। 1989 में नालंदा में अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने जाना कि अपराधी अपराध को अपना पेशा मानते हैं, जिससे मुझे ज़मानत रद्द होने के प्रभाव का अंदाज़ा हुआ। - #सांप्रदायिक दंगे: सच्चाई यह है कि हर दंगा, चाहे वह सांप्रदायिक हो, जातीय हो, जातिगत हो या इसी तरह का, अल्पसंख्यकों पर हमला करता है और इतना आतंक पैदा करता है कि उन्हें दंगा प्रभावित इलाकों से खदेड़ दिया जाता है, और जो लोग भाग जाते हैं, वे अपनी संपत्ति बेच देते हैं। उदाहरण हैं 1989 के भागलपुर दंगे, 2001 का ब्रिटेन में ब्रेडफोर्ड जातीय दंगे, 2013 का नवादा दंगा। - Retd. IPS अभयानंद (from Book Unbounded) ----------------------------- I am convinced that the power of criminals and the potential to commit crimes does not lie in his 'person'; instead, it lies in his assets and his properties. This desire to shift the focus of policing from person to property burned within me for a long time. I got a mere 3 years to put my ideas into practice when I became the police chief. My only silver lining was the Prevention of money laundering act 2002, unfortunately this act does not provide police with any power what so ever. The only role I could play was that of a catalyst for the enforcement directorate (ED), the agency created under the PMLA for the execution of the act. Bihar was the first state to have experimented with this idea and confiscation orders of properties of illegal wealth and laundered white assets of gangsters were passed. The idea that every crime is essentially an economic activity was cemented in my mind from the early days of my career. In my 37 year long journey, I never hesitated in taking uncharted paths trying to uncover New horizons of policing. Examples include: - #Fake sureties [Madhepura 1981 to 1982]: dacoities in Madhepura drop to Nil when I started getting bale bonds that were based on fake sureties cancelled. - #Naxal operations [Aurangabad 1982 to 1983]: the economic force behind the naxal operations came through illegal activities which included smuggling of Kendu leaves to farming on benami land. A quick check on these illegal activities were more than enough to weaken their terror in the area. - #Disproportionate assests [CBI 1984 to 1988] - #Kidnappings [Bettiah 1992 to 1993]: the ransom money, the gangsters received was peanuts, not even sufficient to sustain the establishment cost of the gang. The kidnappings were done to produce terror which would make their money spinning illegal activities easy. I started hitting at these legal activities directly which puts the plans of the gangsters in disarray. - #Mining Mafia [ADG headquarter 2006 to 2008] - #Economic Offences unit [DGP 2011 to 2014]: this unit was created directly reporting to the DGP to check black money to mitigate crime, it became the driving agency for the enforcement directorate to implement PMLA, needless to say, it completely justified the purpose for which it was created. - #Hooch tragedies [DGP 2011 to 2014]: during this period, 3 successive hooch tragedy incidents occurred in the state. Since there was no alcohol Ban at that time, there could be no direct criminal action against the presence of alcohol. I converted these incidents into economic crimes, projecting them as loss of revenue to the state. Their properties got attached under PLA, snatching away their funding source. - #Bail cancellations [DGP 2011 to 2014]: the main idea behind cancelling bail was not to put the criminal behind bars again. These action put these criminals out of their jobs, their sources of livelihood. During my Nalanda tenure in 1989, I had learnt that criminals treated crimes as their profession, which has convinced me about the impact that bail cancellations could have. - #Communal riots: the truth is that every riot whether communal, ethnic, caste or alike, attacks a minority and creates enough terror to chase them out from riot affected areas, the people who flee sell of their properties. Examples are the study of right Bhagalpur riots of 1989, breadford ethnic riots of 2001 in UK, nawada riots of 2013. - Retd. IPS Abhayanand (from Book Unbounded) -----------------------------------