Saturday, 22 May 2021

21 मई 2021 को सेनारी नरसंहार मामले में उच्च न्यायालय के 125 पन्नों के जजमेंट में उल्लिखित तथ्य

 

⁕⁕ सेनारी नरसंहार मामले में उच्च न्यायालय द्वारा 21 मई 2021 को सभी अभियुक्तों को बरी करने के फैसले के 125 पन्नों के जजमेंट में उल्लिखित तथ्य इस प्रकार हैं।

⁕ निचली अदालत से जुड़े तथ्य:
1. मामले में पीड़ित पक्ष के तरफ से case की पैरवी Additional Advocate General योगेंद्र प्रसाद सिन्हा व Additional Public Prosecutor द्वारा की गई जिनमें डॉक्टर मायानंद झा, दिलीप कुमार सिन्हा, श्री अभिमन्यु शर्मा और शशि बाला वर्मा शामिल हैं।

2. मामले में कुल 77 अभियुक्तों पर निचली अदालत में मुकदमा चलाने की अनुशंसा की गई थी जिनमें कोर्ट के द्वारा 45 अभियुक्तों पर charges frame हुए लेकिन मृत्यु व अन्य कारणों से केवल 38 लोगों पर मुकदमा चल सका।

3. मामले में अदालत के सामने कुल 30 गवाह उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज करवाये थे।

4. मामले में विभिन्न साक्ष्यों को भी कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया गया है जिनमें:
Signature of witnesses on enquiry report;
Seizure list;
Inquest report;
FardBayan;
Formal FIR;
Charge sheet;
Postmortem report;
Injury reports;
Sanction order of District Magistrate, Jehanabad;
Report of forensic science laboratory;
One pamphlet.......

5. उच्च न्यायालय द्वारा कई जगह यह बात गवाही के मामले में दर्ज की गयी कि पुलिस द्वारा अनुसंधान के समय जब Section 161 of CrPC के तहत statement दर्ज की जा रही थी, तब उन गवाहों ने उन अभियुक्तों का नाम नहीं लिया था जिनपर उन्होंने  कोर्ट के समक्ष घटना में शामिल होने का आरोप लगाया।

6. Post-mortem reports का भी उल्लेख कोर्ट ने किया है जिसमें हत्या करने के तरीकों में गला रेतना व पेट चीरना लगभग सभी हत्याओं में common है।

7. निचली अदालत में अभियुक्तों ने अपने बचाव में कोई भी साक्ष्य मौखिक या कागजातों के रूप में प्रस्तुत नहीं कीये।

8. केस से जुड़े पहले अनुसंधान पदाधिकारी जमुना सिंह वह दूसरे अनुसंधान पदाधिकारी आलोक कुमार का court examination नहीं हुआ था जिससे भी अभियुक्तों को लाभ मिला।
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⁕ उच्च न्यायालय में अभियुक्तों के बचाव पक्ष की ओर से पैरवी करने वाले वकीलों में सुरेंद्र सिंह, कृष्ण प्रसाद सिंह, भास्कर शंकर, राकेश सिंह, अंशुल, सुनील श्रीवास्तव, गिरीश चंद्र शर्मा, उपेंद्र कुमार व दिलीप कुमार सिन्हा शामिल हैं। अभियुक्तों के बचाव में रखे गए प्रमुख दलील इस प्रकार हैं :

1. गवाह सुरेश शर्मा, दिनेश शर्मा, बलिराम शर्मा का हवाला देते हुए इन वकीलों ने कहा की वह अंधेरी रात थी और किसी व्यक्ति की पहचान artificial illumination के बिना संभव नहीं था, गांव में बिजली भी नहीं थी इसलिए इस घटना में शामिल अभियुक्तों की पहचान की ही नहीं जा सकती थी।

2. उन्होंने कहा कि पुलिस ने अपने अनुसंधान के दौरान कोई भी Test Identification Parade नहीं conduct किया। अभियुक्तों की पहचान dock identification के माध्यम से घटना के बाद 7 से 16 साल के बीच की गई जो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित अन्य फैसलों में दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सका।

3. उन्होंने विभिन्न सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नरसंहारों के मामले में जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हों, उनमें किसी एक अभियुक्त को दोषी साबित करने के लिए कम से कम 2 गवाहों की जरूरत होगी लेकिन 6 सजायाफ्ता अभियुक्तों की पहचान मात्र एक गवाह के द्वारा ही की जा सकी थी जो कि अपर्याप्त था।

4. वकीलों ने कहा कि अभियुक्त सत्येंद्र दास, ललन पासी, गोपाल साव और उमा पासवान को दो गवाहों द्वारा पहचाना गया लेकिन उन गवाहों ने घटना का कोई विवरण कोर्ट के समक्ष नहीं रखा और न हीं इन अभियुक्तों द्वारा कीये गये अपराधों का कोई विवरण दिया।

5. वकीलों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि Bachesh Kumar Singh उर्फ Bachesh Yadav को चार गवाहों, विश्व विजय शर्मा, सुरेश शर्मा, बलिराम शर्मा और श्रीनिवास शर्मा ने पहचाना पर यह गवाह विश्वसनीय नहीं हैं और अपनी गवाह में Bachesh Yadav के अपराध का कोई विवरण उन्होंने नहीं दिया है। घटना के समय उसके उस जगह पर होने की भी पुष्टि नहीं हो सकी है।

6. वकीलों ने यह दलील दिया कि घटना में शामिल अभियुक्तों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है इसलिए भी इन्हें फांसी की सजा नहीं दी जा सकती।

7. वकीलों ने यह दलील दी कि किसी भी अभियुक्त को घटनास्थल पर पकड़ा नहीं जा सका व उनके पास से मामले से जुड़ा कोई recovery भी नहीं हो सका था। ऐसे में उन्हें सजा सुनाने का आधार केवल गवाहों द्वारा पहचान किया जाना है। CrPC 313 के तहत examination के दौरान भी उनके खिलाफ कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
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⁕ उच्च न्यायालय में सरकार के तरफ से पक्ष रखते हुए वकीलों ने यह कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन फैसलों में भी अभियुक्तों को दोषी ठहराया है जिनमें source of light का जिक्र ना हो, और अगर पीड़ित व्यक्ति अभियुक्त को पहले से पहचानता हो तो ऐसे परिस्थितियों में भी पहचान संभव है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में यह माना है कि व्यक्ति की पहचान उसके बोलने के तरीकों, चलने के तरीकों व gestures से भी संभव है।

Additional Advocate General योगेंद्र प्रसाद सिन्हा ने यह दलील दी कि अगर गवाह किसी अभियुक्त को कोर्ट में ही पहली बार भी पहचानता है तो उसे सजा होगी। गवाह द्वारा अभियुक्त की पहचान भी admissible evidence है। उन्होंने कहा कि अभियुक्त और पीड़ित एक दूसरे के जानने वाले थे क्योंकि वह एक ही गांव या आसपास गांव के निवासी थे। उन्होंने विभिन्न ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट में गवाहों द्वारा अभियुक्तों की पहचान substansive evidence है। उन्होंने कहा कि, "as per Supreme Court, CrPC does not oblige the investigating agency to necessarily hold TIP nor is there any provision under which the accused may claim a right to hold TIP. उन्होंने Indian Evidence Act के Section 134 का हवाला देते हुए कहा कि गवाहों की संख्या किसी भी proof of act के लिए जरूरी नहीं है।
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⁕ उच्च न्यायालय विभिन्न तर्कों और सभी पक्षों को सुनने के बाद इन निष्कर्षों को निर्विवाद माना:
1. 18 मार्च 1999 की रात शाम 7:30 बजे सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद लोग ग्राम सेनारी में घुसे, उन लोगों ने रणवीर सेना से जुड़े लोगों की तलाश की, उन्हें ठाकुरबाड़ी के पास ले गए और उनमें से 34 लोगों की हत्या कर दी, घटना शाम के 7:30 बजे से रात 11:30 बजे के बीच घटी।

2. गांव में कोई बिजली नहीं थी व उस दिन अंधेरी रात थी।

3. अपराधी बड़े torchlight का इस्तेमाल कर रहे थे और लोगों ने अभियुक्तों की पहचान उसकी रोशनी में की थी।

4. अनुसंधान के दौरान कोई भी Test Identification parade नहीं की गई थी।

5. अभियुक्तों को दोषी ठहराने का आधार dock identification था जो घटना के बाद 7 साल से लेकर 16 साल के बीच की गई थी।

⁂ न्यायाधीशों ने पुलिसिया अनुसंधान के दौरान Test Identification Parade नहीं होने की बात को बार-बार अपने निर्णय में उद्धृत किया है व अभियुक्तों की पहचान पहली बार कोर्ट में होने की बात को weak evidence बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि सूचना देने वाली चिंतामणि देवी जिनके बयान पर FIR दर्ज की गई थी, उनका prosecution witness के रूप में कोर्ट के समक्ष examination नहीं हो सका था। कोर्ट ने यह भी कहा की चिंतामणि देवी द्वारा घटनास्थल पर उपस्थित लोगों में दर्ज कराए गए 16 नामों में बुधन यादव और गोपाल साहू का नाम नहीं था जो कि सेनारी के ही रहने वाले थे।

लेखक व संकलनकर्ता: साकेत बिहारी शर्मा