"शहीद गायत्री बाबु की वीरगाथा युगों तक रहेगा ब्रह्मर्षियों का प्रेरणाश्रोत"
ये तस्वीर स्वर्गीय गायत्री सिंह की है जो ग्राम - उर विशुनपुर , पोस्ट - उर विशुनपुर , थाना- अलीपुर , जिला - गया के निवासी स्वर्गीय श्री उदय नारायण सिंह जी के पुत्र थे , वे 4 भाइयों में दुसरे क्रम में थे . पुरे गया जिले और खास कर मगध क्षेत्र में इकलौते ऐसे शेरदिल भूमिहार थे, जिन्होंने अपने 4 भाइयों के बल पर हजारों की संख्या में आये माओवादी नक्सलवादियों को मार भगाया था , 1990 की एक रात हजारों नक्सलवादियों ने आक्रमण करके उनको 4 भाइयों और हथियार समेत आत्मसमर्पण करने बोला गया .स्वर्गीय गायत्री बाबु ने उनको ललकारा , और जवाबी फायरिंग स्टार्ट की गयी , कहते हैं की बोरी से भर कर कारतूस रखने वाले और अपने 3 भाइयों के साथ 4 राइफल के बल पर , रात भर की फायरिंग के बाद सबको जान ले कर भागने पर मजबूर कर दिया गया . इस घटना की सुबह तत्कालीन एस. पी अनुराग कश्यप ने साहसी घटना की जमकर तारीफ की और 12 सिपाही साथ में 1 हवालदार को उनके दालान पर तैनात कर दिया , जो करीब 3 साल तक रहा . और इस बीच उग्रवादी भी उनके आस पास नहीं आये , 3 साल के बाद सबने ये सोच लिया की अब उग्रवादियों का डर नहीं , इस तरह पुलिस कैंप को हटा लिया गया , लेकिन उग्रवादी के निशाने पर हमेशा थे , 31 अक्टूबर 1995 की रात करीब 10 बजे उग्रवादियों ने घात लगा कर आक्रमण किया , जिसमे गाँव के कुछ विरोधी तत्वों की मिलीभगत शामिल थी, घर के आगे बने दालान के छत पर चारों भाई एक साथ सो रहे थे , आँख लग गयी थी और दालान के पश्चिम दिशा से सीढ़ी लगा कर उग्रवादी चढ़ गए, और ताबड़तोड़ फायरिंग स्टार्ट कर दिया , गायत्री बाबु समेत 2 भाई स्वर्गीय नंदकिशोर सिंह एवं गिरजेश सिंह की मौके पर मौत हो गयी , एक भाई ने हाथ में राइफल ले कर सामने की तरफ कमरे में छलांग लगा दी , और मुकाबले के लिए तैयार हो गए , लेकिन किस्मत ख़राब थी , राइफल में मात्र 6 गोली जो मैगजीन में होती है , वही रह गयी शेष गोलियों का बेल्ट सिरहाने के पास रह गया , लेकिन उन्होंने हार न मानी उन 6 गोलियों के बल पर 1 घंटे तक पास आने नहीं दिया , उस समय समाज की कायरता सामने आई जब ये लोग शहीद हो रहे थे तो किसी ने साथ नहीं दिया , कोई किसी के गाँव में आकर किसी को मार नहीं सकता जब तक वहां के लोग साजिश में शामिल न हो , घर फूटे गाँव लुटे , गाँव फूटे naxalite लुटे ये बात यही साबित हुयी . अंत में अवधेश बाबु भी उग्रवादियों के हाथ शहीद हो गए , लेकिन उनको मारना इतना आसान न था , अंत समय तक पारंपरिक हथियार से मुकाबला किये , और 2-4 को घायल किये , और शहीद हो गए . उसके बाद नक्सलवादियों ने सभी को घर से बाहर करके घर में आग लगा दिया , घर के सारे सामान, कपडे, अनाज को लूट ले गए . सुबह प्रान्त के सभी नेताजी लोग का जमावड़ा लगा , मुआवजा देने का और सान्तवना देने का सिलसिला चला . आज के समय सोचता हुँ कि वो अकेले हजारों नक्सलवादियों पर भारी पड़े थे , उनकी सहायता में समाज के लोग नहीं आये , बारा नरसंहार की घटना कुछ ऐसी ही थी .आज समाज के लोगों को वैचारिक रूप से सशक्त होने की जरुरत है !!!
संकलनकर्ता
✍️ साकेत बिहारी शर्मा
संकलनकर्ता
✍️ साकेत बिहारी शर्मा

Sat sat naman in balidani mahapurushon ko
ReplyDeleteHum pehli baar jaane ki humare samaj ke aise bhi veer yodha the....aise mahan insaan ko mera dill se naman...
ReplyDeleteशत शत नमन 💐
ReplyDeleteUnforgettable period.
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